वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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'योगिनीहृदय' में भी इसका प्रतिपादन किया गया है—'धर्माधर्मस्य वाच्यस्य
विषामृतमयस्य च । वाचकाक्षरसंयुक्तेः कथिता विश्वरूपिणी । तेषां समष्टिरूपेण
पराशक्ति तु मातृकाम् । कूटत्रयात्मिकां देवी समष्टिव्यष्टि रूपिणीम् । आद्यां शक्ति
भावयन्तो भावार्थ इति मन्वते ॥'—इसकी पुष्टि में कहा गया है—'परदेवता' वामा
आदि सात शक्तियों की समष्टि है । यह ३६ तत्त्वों वाली एवं किसी भी माने में
इस मन्त्र से भिन्न नहीं है—'षटत्रिंशत्तत्त्वरूपास्मान्मात्रयापि न भिद्यते ॥'१ 'भावार्थ'
इसी भाव को व्यक्त करता है कि देवी, मन्त्र एवं जगत् में अभेद है—
'तेनाम्बामनुजगतामभेद एवात्र भावार्थः ।'२
१. परात्परशक्ति सप्तशक्तियों से अभिन्न है । ⎤
२. वह शक्ति छत्तीस तत्त्वों से भी अभिन्न है । ⎥ त्रिविध अभेद
३. वह पराशक्ति मन्त्र से भी पूर्णतया अभिन्न है । ⎦
पराशक्ति का सप्त शक्तियों से ३६ तत्त्वों से एवं मन्त्र से अभेद है ।
तदेतत् सर्वमभिसंधायाह—
अहकारौ शिवशक्ती शून्याकारौ परस्परार्श्लिष्टौ ।
स्फुरणप्रकाशरूपावुपनिषदुक्तं परं ब्रह्म ॥ ६९ ॥
विश्वसिसृक्षावशतः स्वार्धी शक्तिं विलोकयद्ब्रह्म ।
बिन्दूभवति तमिन्दुं प्रविशति शक्तिस्तु रक्तबिन्दुतया ॥ ७० ॥
एतत् पिण्डद्वितयं विसर्गसंज्ञं हकारचैतन्यम् ।
मिश्रस्तु तत्समष्टिः कामाख्यो रविरकारचैतन्यम् ॥ ७१ ॥
एषाहंपदतुर्यस्वरकामकलादिशब्दनिर्देश्या ।
वागर्थसृष्टिबीजं तेनाहंतामयं विश्वम् ॥ ७२ ॥
अन्त्यप्रथमे मध्यचतुर्थे मन्त्रेऽपि तौ व्यक्तौ ।
तेनाम्बामनुजगतामभेद एवात्र भावार्थः ॥ ७३ ॥
(अकार एवं हकार की ब्रह्मरूपता)
'अकार' एवं 'हकार' शिवशक्तिस्वरूप, शून्याकार, परस्पर आश्लिष्ट, स्फुरणा-
स्वरूप एवं प्रकाशरूप हैं तथा उपनिषदप्रोक्त परब्रह्म के स्वरूप वाले हैं ॥ ६९ ॥
(सिसृक्षुब्रह्म की सृजन-प्रक्रिया)
विश्व-सर्जन की आकांक्षा के वशीभूत होकर (सिसृक्षु) ब्रह्म अपनी अर्धांगिनी
शक्ति का प्रेक्षण करता हुआ 'बिन्दु' का स्वरूप धारण कर लेता है । उस बिन्दु में
शक्ति 'रक्तबिन्दु' के रूप में प्रवेश करती है ॥ ७० ॥
१-२. वरिवस्यारहस्यम्