वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 160 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयाऽध्याय १ आन्हिक ६१
वा समव्याप्ति कहते हैं । जो वर्त्ताव सब देशों और सब कालों में पाया जावे,
वह ' व्याप्यवृत्ति' कहाता है, तथा जो एक देश या एक काल में वर्त्तता है
उस को 'अव्याप्यवृत्ति' कहते हैं ॥
जो देश विशेष के कारण से हो उस को ' देशकृताऽव्याप्यवृत्ति ' और
जो काल विशेष के कारण से हो उस को ' कालकृताऽव्याप्यवृत्ति ' कहते
हैं । अधिक बात यह है कि अव्याप्यवृत्ति पदार्थ की भी अधिकरणता व्याप्य-
वृत्ति होती है, अव्याप्यवृत्ति नहीं हुआ करती । जैसे-दण्डी पुरुषः = दण्ड-
वाला पुरुष । इस में यद्यपि पुरुष के एक देश ( हाथ) में दण्ड का संयोग
है, तथापि समग्र पुरुष को दण्ड की अधिकरणता ( आश्रय ) कही जाती
है, न कि पुरुष के एक देश ( हाथ वा अङ्गुलियों ) को । इस कारण देशकृत
ऽव्याप्यवृत्ति हुई ॥
अन्वयव्याप्ति और व्यतिरेकव्याप्ति इस प्रकार भी व्याप्ति के दो भेद हैं ।
साध्य साधन की व्याप्ति अन्वयव्याप्ति और साध्याऽभाव और साधनाऽभाव
की व्याप्ति व्यतिरेकव्याप्ति कहाती है । जैसे-जहां धुंवां है वहां अग्नि है। यह
अन्वयव्याप्ति हुई, तथा जहां अग्नि नहीं वहां धुंवां नहीं। यह व्यतिरेकव्याप्ति
हुई । नवीन नैयायिक गदाधरादि लोग अन्वयव्याप्ति का लक्षण इस प्रकार
करते हैं कि-हेतुसमानाधिकरणात्यन्ताऽभावाऽप्रतियोगिसाध्यसामानाधि-
करण्यं व्याप्तिः। हेतु के समानाधिकरणस्थ अत्यन्ताऽभाव को 'हेतुसमानाधिकर-
णाऽत्यन्ताऽभाव' कहते हैं। जिस का अभाव हो उस को प्रतियोगी और जिस का
अभाव न हो (भाव हो) उस को अप्रतियोगी कहते हैं । साध्य के साथ समान
(एक) अधिकरण में रहना = साध्यसामानाधिकरण्य कहाता है। अब नवीनों के
लक्षण का अर्थ यह हुवा कि “हेतु के साथ समानाधिकरणस्थ अत्यन्ताऽभाव
के अप्रतियोगी साध्य के साथ हेतु की समानाधिकरणता = अन्वयव्याप्ति
है”। अर्थात् जो साध्य के हेतु के अधिकरणस्थ अत्यन्ताऽभाव का प्रतियोगी
नहीं, उस के साथ हेतु की एकाधिकरणता वा समानाधिकरणता होना =
हेतु में साध्य की व्याप्ति = अन्वयव्याप्ति कहाती है । जैसे-पर्वत अग्नि वाला
है, धूम से, जैसा-रसोई घर । इस अनुमान में पर्वत तो पक्ष है, अग्नि
वाला होना साध्य है, धूम हेतु है और रसोईघर दृष्टान्त है । हेतु के अधि-
करण पर्वत वा रसोई घर आदि में अग्नि = साध्य के वर्त्तमान होने से अग्नि