वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 160 में से
संदर्भ में पढ़ें[Page-header: द्वितीयाऽध्याय २ आन्हिक ३९]
इत्यादि में काल को भी सूर्य पृथिवी आदि की उत्पत्ति का कारण
कहा गया है ॥ ९ ॥
काल की परीक्षा करके आगे दिशा की परीक्षा करते हैं:—
८९—इतइदमिति यतस्तद्दिश्यं लिङ्गम् ॥ १० ॥
( इतः ) इस ओर से ( इदम् ) यह है ( इति ) यह व्यवहार ( यतः )
जिस कारण से होता है ( तत् ) वही ( दिश्यं ) दिशा का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग है ॥
दिशा न होती तो इधर पूर्व, इधर पश्चिम, इधर उत्तर वा दक्षिण से
यह आता है, जाता है, रहता है, इत्यादि व्यवहार नहीं चलते । इन व्यवहारों
का होना जिस कारण से होता है, वही कारण पदार्थ दिशा कहाता है ॥ १० ॥
९०–द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ ११ ॥
( द्रव्यत्वनित्यत्वे ) [ दिशा का भी ] द्रव्य होना और नित्य होना
( वायुना ) वायु के नित्यत्व और द्रव्यत्व कथन से ( व्याख्याते ) कहेगये ॥
जिस प्रकार वायु अपने स्पर्श लिङ्ग से द्रव्य और कार्य न होने से नित्य
है, इसी प्रकार दिशा भी अपने इधर उधर पूर्व पश्चिमादि व्यवहार लिङ्गों
से द्रव्य और कार्य न होने से नित्य है । यह नित्यता व्यावहारिक है ॥ ११ ॥
९१–तत्त्वं भावेन ॥ १२ ॥
( तत्त्वं ) एकत्व ( भावेन ) भाव के साथ व्याख्यात है ॥
जिस प्रकार सत्ता = भाव की एकता कही थी इसी प्रकार दिशा की
एकता समझनी चाहिये । यद्यपि पूर्वादि भेद से दिशा ४ वा कोणों को गिन
कर ८ वा ऊपर नीचे को गिनकर ६ वा १० दिशा भी कहाती हैं, परन्तु
दिशापन के सामान्य से एक ही है ॥ १२ ॥
तो फिर दिशा अनेक क्यों कहाती हैं ? उत्तर-
९२–कार्यविशेषेण नानात्वम् ॥ १३ ॥
( कार्यविशेषेण ) कार्यविशेष से ( नानात्वम् ) दिशाओं को अनेकता
है ॥ १३ ॥ प्र०-कार्यविशेष क्या है ? उत्तर-
९३–आदित्यसंयोगाद् भूतपूर्वाद्भविष्यतोभूताच्च प्राची ॥१४॥