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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 160 में से

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पृष्ठ 22

१८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
सामान्य विशेष पदार्थ के होने में प्रमाण है ॥
जो कि व्यावहारिक नित्य समानता अनेक व्यक्तियों में समवाय सम्बन्ध
से वर्त्तमान है, उसी को वैशेषिक दर्शन का लाक्षणिक सामान्य जानिये, जो
कि भिन्न २ वस्तुओं में समान बुद्धि को उत्पन्न करता है। इस से अतिरिक्त जो
एक पदार्थ से दूसरे के भेद की बुद्धि को उत्पन्न करता है, वह विशेष है।
जैसे एक स्थान में चार मनुष्य बैठे हैं, उन चारों में मनुष्यपना एकसा या
समान है, इस समानता की पहचान कराने वाला जो पदार्थ है, वही यहां
वैशेषिकदर्शन में "सामान्य" कहाता है। जब उन्हीं चारों में एक बालक है,
दूसरा युवा है, तीसरा वृद्ध है और चौथा रोगी है। तौ वह पहचान जिस
से कि एक को बालक, दूसरे को युवा, तीसरे को वृद्ध और चौथे को रोगी
समझते हैं, जिस से हम बालक को युवा नहीं समझते, युवा को
वृद्ध नहीं समझते, वा वृद्ध को रोगी भी नहीं समझते, इस पहचान का
कराने वाला, बालक से युवा, युवा से वृद्ध और वृद्ध से रोगी के भेद को
जताने वाला जो कोई पदार्थ है, वही वैशेषिक दर्शन में विशेष कहाता
है। इस प्रकार विशेष में सामान्य व्यापक हुवा करता है, परन्तु विशेष
व्याप्य हुवा करता है, जैसे बालक होने पर भी और युवा से भिन्न होने पर भी
मनुष्यपना दोनों में पाया जाता है, बालक भी मनुष्य है, युवा भी मनुष्य
है, वृद्ध भी मनुष्य है और रोगी भी मनुष्य है, परन्तु बालक, युवा नहीं,
युवा वृद्ध नहीं, वृद्ध रोगी नहीं, तब बालकत्व युवत्व वृद्धत्व और रोगित्व
तौ विशेष कहायेगा, तथा मनुष्यत्व सामान्य है ॥
इस सामान्य विशेष को बुद्धयपेक्ष इस लिये कहा है कि जो पदार्थ एक
बुद्धि की अपेक्षा सामान्य कहा है, वही दूसरी बुद्धि की अपेक्षा विशेष भी
बनजाता है। जैसे जो मनुष्यपना बाल युवा वृद्ध में सामान्य है, वही
मनुष्यपना, पशु पने वा पक्षिपने में विशेष भी है । बालक, युवा, वृद्ध और
रोगियों में हमारी बुद्धि मनुष्यत्व को समान जानती थी, परन्तु मनुष्य,
पशु, पक्षियों में, जहां तीनों हों, वहां हमारी बुद्धि पशु और पक्षियों से
मनुष्य को भिन्नता से पहिचानने के लिये व्यावर्तक=विशेष निश्चित करती है।
इस लिये सामान्य और विशेष प्रति नियत पदार्थ नहीं, किन्तु बुद्धयपेक्ष हैं।
क्योंकि जो कुछ एक वस्तु की दूसरे वस्तु के साथ समानता है, वही एक