वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१ अध्याय २ आन्हिक १७
उत्तरवर्त्ती कार्य कहावेगा । यह कार्य कारण का स्वरूप है। जैसे बीज कारण
और अङ्कुर कार्य है ॥ १ ॥
३३-न तु कार्याऽभावात्कारणाऽभावः ॥ २ ॥
(तु) परन्तु (कार्याऽभावात्) कार्य के अभाव से (कारणाऽभावः)
कारण का अभाव (न) नहीं होता ॥
जिस प्रकार कारण के अभाव से कार्य हो नहीं सकता, इसी प्रकार कार्य के
अभाव में कारण भी न हो, यह नियम नहीं। मिट्टी के अभाव में घड़ा तौ
अवश्य न होगा, परन्तु घड़े के अभाव में मिट्टी का अभाव आवश्यक नहीं।
मिट्टी (कारण), घड़े (कार्य) के बिना भी होती है ॥ २ ॥
द्रव्य गुण कर्मों के लक्षण और स्वरूप को समझने के लिये उन का परस्पर
साधर्म्य, वैधर्म्य भी कहा गया । कार्य क्या है, कारण क्या है, यह भी भले
प्रकार बताया गया। अब अध्याय १ सूत्र ४ चतुर्थोक्त क्रम से द्रव्य गुण कर्म
से अगले सामान्य और विशेष के लक्षण और परीक्षा को आगे कहना चाहते
हुये आचार्य्य, इस विषय में अनेक वादियों की विप्रतिपत्तियें जानकर प्रथम
सामान्य विशेष के होने में प्रमाण कहते हैं:-
३४-सामान्यं विशेष इति बुद्ध्यपेक्षम् ॥ ३ ॥
(सामान्यं) सामान्य (विशेषः) विशेष (इति) यह दोनों (बुद्ध्यपेक्षम्)
समझ की अपेक्षा से हैं ॥
द्रव्यादि पदार्थों में एक दूसरे से भेद होने पर जो हमारी समझ में
समानता आती है, वही सामान्य पदार्थ है। जैसे द्रव्य सत् है, गुण भी सत्
है, कर्म भी सत् है, तीनों में सत्ता (होना) समान है, बस यही उन में सामान्य
है। अब द्रव्य से गुण में भेद करने वाले लक्षण जैसे (अगुणवान्) गुणान्तर
रहित होना, यह द्रव्य से गुण का विशेष है, इसी से हम समझते हैं कि
द्रव्य और गुण भिन्न २ दो पदार्थ हैं। इसी प्रकार कर्म में सत्तामात्र के सामान्य
रहते भी अध्याय १ सूत्र १७ की विशेषता कि एक द्रव्य वाला, गुणरहित,
संयोग विभाग में निरपेक्ष कारण होना कर्म की विशेषता (विशेष) हैं, जिन
से हम कर्म को द्रव्यादि से पृथक् समझते हैं। यह जो हमारी समझ है, यही
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