बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
शक्तिं सम्प्रेषयेत् सम्यग्वेगेन स्वीयतेजसा ।
मध्यदण्डाभ्रमणेन मन्थूनां भ्रमणं भवेत् ॥३७४॥
भ्रमणाद् द्रावके शक्तिः प्रविश्याथ यथाक्रमम् ।
तत्रत्यमणिभिस्सम्यगाकृष्टा व्रजति क्षणात् ॥३७५॥
उनके अन्दर स्थित सिब्जीरमणि ? भी वैसे ही अंशुमित्रमणि भी इस शक्ति को खींचती
है, उस शक्ति को अंशुरादर्श के आवरण को लेकर विद्युदाकर्षणमणि सन्धि में नियुक्त करवे,
पश्चात् अन्दर स्थित कर्णिकाओं-छल्लों या फूलदार पेचों को ? उस शक्ति को सम्यक् लेले उनके नीचे
वाले दण्डों में मध्य दण्डाग्र से शक्ति को वेग से स्वीयतेज से प्रेरित करवे, मध्य दण्ड के घुमाने
से मन्थुओं—मन्थन साधनों का भ्रमण होता है भ्रमण से द्रावक शक्ति प्रविष्ट होकर यथाक्रम यहां की
मणियों से तुरन्त खींची हुई गति करती है ॥३७१-३७५॥
तद्वेगान्माणयस्सम्यग्भ्रामयन्त्यतिवेगतः ।
तद्वेगाच्छक्तेो†रुत्पत्तिरत्यन्तं प्रभवेत् क्रमात् ॥३७६॥
एकछोटिकावच्छिन्नकाले शक्तिः स्वभावतः ।
अशीत्युत्तरसहस्रलिङ्गुमात्र भवेत्स्वतः ॥३७७॥
दोलामुखस्थगणपयन्त्रेणाथ यथाविधि ।
समाकृष्याथ तच्छक्तिं स्थापयेन्मध्यकेन्द्रके ॥३७८॥
उसके वेग से मणियां अतिवेग से घूमती हैं उनके वेग से शक्ति की अत्यन्त उत्पत्ति हो
जाती है, एक चुटकी बजाने मात्र काल में स्वभावतः शक्ति १०८० लिङ्गु (डिग्री) मात्रा में स्वतः हो जावे
दोलामुखस्थित गणपयन्त्र से यथाविधि उस शक्ति को खींचकर मध्य केन्द्र में स्थापित करे ॥३७६-३७८॥
अथ गणपयन्त्रस्वरूपमाह स एष—अब गणप यन्त्र के स्वरूप को उसने ही कहा है—
वितस्त्यैकायामयुक्तं वितस्तित्रयमुन्नतं ।
कुर्याद् विघ्नेश्वराकारयन्त्रमेकं यथाविधि ॥३७६॥
तदुत्तमाङ्गाच्छुण्डीराकारवद् वक्रतं क्रमात् ।
काचावरणसंयुक्तमन्तस्तन्त्रिसमायुतम् ॥३८०॥
नालमेकं प्रकल्प्याथ दोलामुखस्थकीलके ।
सन्धार्यागणपकण्ठनाभ्यन्तं पार्श्वयोर्द्वयो ॥३८१॥
१ बालिस्त लम्बाई युक्त ३ बालिस्त ऊंचा विघ्नेश्वराकार वाला—गणपति आकार वाला
एक यन्त्र यथाविधि, उसका ऊपर का आकार शुण्डीराकार वाला—हाथी शूण्डाकार वाला क्रमशः वक्र
बनावे, काच के आवरण से युक्त अन्दर—तारोसहित एक नाल बनाकर दोलामुख में स्थित कील में
लगाकर गणपयन्त्र के कण्ठ नाभि तक दोनों पाश्वों में लगावे ॥२७६-३८१॥
अङ्गुलत्रयविस्तारं दन्तचक्राणि योजयेत् ।
तथैव तत्कण्ठदेशे बृहच्चक्रं च स्थापयेत् ॥३८२॥
† शक्तित्पत्तिः ? (हस्तलेखपाठः) ।
त्रिपुरविमान ] [ ३४३
करमध्यादागताया. शक्तेश्चलनवेगत ।
बृहच्चक्रं स्वभावेन भ्राम्यते वेगतः क्रमात् ॥३८३॥
तद्वेगतोन्तरचक्राणां भ्रमणं स्याद् यथाक्रमम् ।
तथा कीलकसन्धानं कारयेद् विधिवत् ततः ॥३८४॥
आवृत्ततन्त्रिं तन्मध्ये कुण्डलीवत् प्रकल्पयेत् ।
तन्मध्ये सप्तषष्टिशङ्क (शङ्कु ?)†सिंहिकाभिधम् ॥३८५॥
३ अङ्गुल चौड़े बड़े दान्तों वाले चक्र लगावे, उसी भांति उसके कण्ठ देश में बड़ा चक्र
स्थापित करे, कर-शुण्ड से आई हुई शक्ति के चलनवेग - गतिवेग से बड़ा चक्र स्वभाव से वेग से
घूमता है उसके वेग से अन्दर के चक्रों का भ्रमण यथाक्रम हो जावे इस प्रकार कील जोड़ना चाहिए।
घूमने वाला तार उसके मध्य में कुण्डली की भांति रखे उसके मध्य में शङ्क सिंहिक नाम का ऊपर से
पीठ वाला हो ॥३८२-३८५॥
क्रव्यादलोहावरणसंयुक्तं स्थापयेद् दृढम् ।
जीवावकद्रावकं च पञ्चचञ्चू प्रमाणत ॥३८६॥
सम्पूर्य तस्मिन् सप्तदशोत्तरद्विशतात्मकम् ।
भामुखप्रामुखं नाम मणिं संयोजयेत् तत ॥३८७॥
अङ्गुलद्वयमायामच्छत्रीन् पञ्च प्रकल्प्य च ।
बृहद्गुञ्जीप्रमाणांशु पञ्चांशुमित्रमणीन् क्रमात् ॥३८८॥
सन्धारयेत् पञ्च छत्रीशिखरेषु यथाक्रमम् ।
एकीभूयाथ तत्पञ्चछत्रिणो भ्रामयन्त्यथा ॥३८६॥
तथा कीलकसन्धानं कृत्वा शङ्कोपरि न्यसेत् ।
अंशुपादर्शावरणं तेषामुपरि कल्पयेत् ॥३९०॥
क्रव्याद् लोहे-तीक्ष्ण जाति लोहे-ताम्बा मिल लोहे के आवरण से युक्त स्थापित करे,
जीवावक-शङ्क ? के द्रावक ५ चञ्चू-चून्च-चमच ? या एरण्ड प्रमाण ? प्रमाण से भरकर उससे
२१७ भामुख ? प्रामुख ? मणि को लगावे । २ अङ्गुल लम्बी ५ छत्रियों को युक्त करे बडी गुञ्जा-रत्ति
के माप की ५ अंशुमित्र - सूर्यकान्त मणियों को पांच छत्रियों के शिखर पर लगावे जड़े फिर वे छत्रियों
को मिलकर घुमाती हैं उस कील को लगाकर शङ्क के ऊपर इसे अंशु दर्पण का आवरण उनके
ऊपर रखे ॥३८६-३९०॥
तत्सूर्यकिरणांन्तस्स्थशक्तिं स्वस्मिन् स्वभावत' ।
: चतुरशीतिलिङ्गप्रमाणवेगं स्वशक्तितः ॥३९१॥
एकछोटिकावच्छिन्नकालेनाकृष्य तान् पिबेत् ।
पश्चादावरणादर्शस्थितशक्तिं स्वतेजसा ॥३६२॥
पूर्वोक्तछत्रीशिखरस्थिता ये मणयः क्रमात् ।
† शङ्कु या शङ्ख पाठ होना चाहिए । श्लोक ३९० में शङ्क है, अतः शङ्क यहां भी रखा है।
तिवेगतः ।
Line 7: सहस्रलिङ्गुप्रमाणविद्युत् सजायते क्रमात् ॥३६५॥
Line 8: उन सूर्यकिरणों के अन्दर स्थित शक्ति को स्वभावतः अपने अन्दर ८४ लिङ्गु (डिग्री) प्रमाण
Line 9: का वेग चुटकी बजाने मात्र समय में खींच कर उन्हें पी ले, पश्चात् आवरण आदर्श में स्थित शक्ति
Line 10: को अपने तेज से पूर्व कही छत्री शिखरों में स्थित वे मणियां उस शक्ति को खींच कर वेग से पीती हैं-
Line 11: लेती हैं पश्चात् शक्ति वेग से मणियां घूमती हैं एक चुटकी बजाने समय में सहस्र लिङ्गु (डिग्री) की
Line 12: बिजुली उत्पन्न हो जाती है ॥३६१-३६५॥
Line 13: शङ्खस्थद्रावकं पश्चात् तच्छक्तिमपकर्षति ।
Line 14: द्रावकस्थमणिः पश्चात् स्वपूर्वमुखतः क्रमात् ॥३६६॥
Line 15: समाकृष्याथ तच्छक्तिं वेगात् पिबति तत्क्षणात् ।
Line 16: ततस्तत्पश्चिममुखाच्छक्ति प्रवहति स्वतः ॥३६७॥
Line 17: कार्यनिर्वाहणायाथ तच्छक्तिं तन्त्रीभिः क्रमात् ।
Line 18: समाहृत्यातिवेगेन यत्र कुत्रापि
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