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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 208 में से

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पृष्ठ 191

त्रिशतिका 163
तत्स्थ-- गुणन की एक विधि (A method of multiplication)
त्रिशतिका-सूत्र 6, पृ. 13
त्र्यस्र- त्रिकोण त्रिभुज।
पूर्व-प्रयोग - भगवती-सूत्र में।
त्रिशतिका श्लोक 43, पृ. 115
उ.प्र. लीलावती-क्षेत्र व्यवहार श्लोक 1, पृ. 172 आदि अनेक बार
त्रैराशिक- तीन राशियों के आधार पर समानुपात (Direct proportion
based on the rule of three)
त्रैराशिक-फलराशिं तमथेच्छाराशिना हतं कृत्वा। लब्धं प्रमाणभजितं
तस्मादिच्छाफलमिदं स्यात्। आर्यभटीय 1.26
ब्रा.स्फु.सि. में 20 परिकर्म में से एक
त्रिशतिका सूत्र 29 में पृ. 49
लीलावती त्रैराशिक सूत्र 7, पृ. 100 तथा आगे
दैर्घ्य- लम्बाई (length)
पू.प्र. - --- अग्रतलैक्यार्धमौच्च्यदैर्घ्यगुणम् - ब्रा.स्फु.सि. 12.47
त्रिशतिका सूत्र 52, 53 आदि पृ. 137
उ.प्र. लीलावती, खात व्यवहार उदा. श्लोक 1 पृ. 303
गणित में यह शब्द विस्तार (चौड़ाई) के सापेक्ष प्रयुक्त है। यह स्थिति
न्याय वैशेषिक से भिन्न है। वहाँ 'दीर्घ' शब्द 'ह्रस्व' के विरोधी के रूप में संख्यात
है। दर्शन का मानना है कि इक्षु आदि में वस्तुतः 'दीर्घत्व' ही है। यदि उसमें कभी
अन्य के सापेक्ष ह्रस्व का प्रयोग होता है तो वह औपचारिक तथा अवास्तविक है।
द्रष्टव्य- परिमाणं---चतुर्विधम्-अणु, महद् दीर्घ ह्रस्वं चेति--- समिदिषु-
वंशादिष्वंजसा दीर्घेष्वपि प्रकर्षाभावमपेक्ष्य भाक्तो ह्रस्वत्वव्यवहारः -प्रशस्तपाद भा०
परिमाण प्रकरण पृ. 320
प्रक्षेप (बीज या मूलधन)
प्रक्षेपयोगहृतया लब्ध्या प्रक्षेपका गुणा लाभाः- ब्रा.स्फु.सि 12.16
त्रिशतिका सूत्र 38, पृ. 92
उ.प्र. - प्रक्षेपका मिश्रहता विभक्ता प्रक्षेपयोगेन पृथक् फलानि-लीलावती
मिश्रक-व्यवहार श्लोक 13 पृ. 126