त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें162 त्रिशतिका
ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त 12.1 में 20 परिकर्म में से एक
घनोऽसौ समत्रिराशिहतिः-त्रिशतिका सूत्र 15 पृ. 21
समत्रिघातश्च घनः प्रदिष्टः-लीलावती, अभिन्नपरिकर्माष्टक, श्लोक 11
घनमूल (Cube root)
अघनाद् भजेद् द्वितीयात् त्रिगुणेन घनस्य मूलवर्गेण-आर्यभटीय 1.5
ब्रा.स्फु.सि. 12.1 में 20 परिकर्मों में से एक
त्रिशतिका सूत्र 18, पृ. 24
घनं तदाद्याद् घनमूलमेव....लीलावती, अभिन्न-परिकर्माष्टक, श्लोक 15, पृ.
33
चाप-परिधि-खण्ड की लम्बाई (arc length)
त्रिशतिका सूत्र 47, पृ. 126
विस्तार के लिये देखें- 'कार्मुक' शब्द
चिति, चितिफल = चुनी हुई ईंटों का घनफल (volume of a prism)
ब्रा.स्फु.सि. 12.1 में 8 व्यवहारों में से एक चिति-व्यवहार।
त्रिशतिका सूत्र 58, पृ. 148
उ.प्र. - उच्छ्रयेण गुणितं चितेः किल क्षेत्रसम्भवफलं घनं भवेत्।।
- लीलावती, चितिव्यवहार, श्लोक 1, पृ. 310
छायाव्यवहार- छाया की लम्बाई से दिनमान।
ब्रा.स्फु.सि. 12.1 में 80 व्यवहारों में से एक।
त्रिशतिका सूत्र 65, पृ. 157
लीलावती-छायाव्यवहार श्लोक 1 से 5, पृ. 319 तथा आगे
जीवा या ज्या (chord)
पू.प्र. - वृत्ते शरोनगुणितात् व्यासच्चतुराहतात् पदं जीवा-ब्रा.स्फु.सि. 12.41
ज्या के लिये ब्रा.स्फु.सि. 12.42
त्रिशतिका सूत्र 47, पृ. 95 तथा त्रिशतिका उदा. 86, पृ. 127
----आद्योनितेन खलु तेन भजेच्चतुर्घ्नव्यासाहतं प्रथममाप्तमिह ज्यका स्यात्।
-लीलावती, क्षेत्रव्यवहार श्लोक 48, पृ. 298