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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 208 में से

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पृष्ठ 147

त्रिशतिका 119
उसका लम्ब है। क्योंकि इस विशेष चतुर्भुज में दोनों विकर्ण एक दूसरे पर लम्बवत्
हैं। अतः इस आबाधा को त्रिभुज का लम्ब कहा जा सकता है। श्रीधर ने अन्य
आबाधा की अपेक्षा किये बिना आबाधा जानने का सूत्र नहीं दिया है। अतः पहले
भास्कराचार्य के सूत्र¹ का उपयोग करते हुए दोनों विकर्णों की आबाधा ज्ञात करते
हैं–
DO तथा OB का अलग-अलग परिमाप = ½ (56 ± (39²–25²) / 56)
⇒ ½ (56 ± (1521–625) / 56) ⇒ ½ (56 ± 16) ⇒ 36 तथा 20
CO तथा OA का अलग-अलग परिमाप = ½ (63 ± (60²–39²) / 63)
⇒ ½ (63 ± (3600-1521) / 63)
⇒ ½ (63 ± 33) ⇒ 48 तथा 15
इस प्रकार आबाधा का अलग-अलग परिमाप ज्ञात कर लेने पर त्रिभुज के
क्षेत्रफल का द्वितीय सूत्र समन्वित करते हैं–
△ ABD का क्षेत्रफल = 56/2 × 15 = 420
△ BCD का क्षेत्रफल = 56/2 × 48 = 1344
──────────────────────
योग = 1764
──────────────────────
△ ABC का क्षेत्रफल = 63/2 × 20 = 630
△ ADC का क्षेत्रफल = 63/2 × 36 = 1134
──────────────────────
योग = 1764
──────────────────────
इन दोनों प्रकार के त्रिभुजों का योग वही 1764 होता है। इससे भी हमने
ठीक वही पूर्वोक्त परिणाम प्राप्त कर लिया है।
अन्यदुदाहरणम्
एको भुजस्त्रयोदश पञ्चदशान्यस्त्रिबाहुनि क्षेत्रे।
चतुराधिकदशभूमि द्वादश लम्बः कियद् गणितम्।। 81।।
१. त्रिभुजे भुजयोर्योगस्तदन्तरगुणो भुवा हतो लब्ध्या।
द्विष्ठा भूरूनयुता दलिताऽऽबाधे तयोः स्याताम्।। –लीलावती, क्षेत्रव्यवहार, श्लोक 18