त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशतिका 117
भुजयुतिदल या s = ½ (25 + 52 + 60 + 39) = 88
चतुर्भुज का क्षेत्रफल = √((88-25) × (88-52) × (88-60) × (88-39))
⇒ √(63 × 36 × 28 × 49) ⇒ √3111696 = 1764 वर्ग हस्त
इसके चक्रीय चतुर्भुज होने के कारण इस सूत्र के द्वारा प्राप्त फल सर्वथा
सुनिश्चित एवं वास्तविक है। इसमें एक सुनिश्चित विकर्ण (diagonal) खींच कर
हम यही परिणाम प्राप्त करते हैं।
[चित्र: चक्रीय चतुर्भुज ABCD; भुजाएँ AB = 25b, BC = 52c, CD = 60 d, DA = 39 a; विकर्ण AC = n 63, BD = m 56; प्रतिच्छेद बिन्दु O]
श्रीधराचार्य ने चक्रीय चतुर्भुज के लिये बनने वाले विकर्ण की नाप नहीं
बताई है। अतः ब्रह्मगुप्त के सूत्र¹ के द्वारा पहले इसे ज्ञात करते हैं।
AC विकर्ण की परिमाप ज्ञात करने के लिये-
n = √[ {(39 × 25 + 60 × 52) (39 × 52 + 60 × 25)} / (52 × 25 + 39 × 60) ]
⇒ √[ {(975 + 3120) (2028 + 1500)} / (1300 + 2340) ]
⇒ √[ (4095 × 3528) / 3640 ]
⇒ √[ 14447160 / 3640 ] ⇒ √3969 ⇒ 63 विकर्ण AC
BD विकर्ण की परिमाप ज्ञात करने के लिये-
m = √[ {(52 × 25 + 39 × 60) (39 × 52 + 60 × 25)} / (39 × 25 + 60 × 52) ]
१. कर्णाश्रितभुजघातैक्यमुभयथाऽन्योन्यभाजितं गुणयेत्।
योगेन भुजप्रतिभुजवधयोः कर्णौ पदे विषमे।। - ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त 12.28