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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 92

७८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
मया सङ्गम्य मन्मातृपुरमासादयद् द्रुतम् ।
मन्मातरं परिष्वज्य मुहुर्मुहुरकल्मषा ॥ १४० ॥
आनन्दार्णवनिर्मग्नस्वभावाऽभवदञ्जसा ।
एवं त्वमपि दुर्वृत्तं निगृह्य सखिसम्भवम् ॥ १४१ ॥
प्राप्य स्वमातरं नाथ सुखं नित्यं समाप्नुहि ।
एतत्ते कथितं नाथ स्वानुभूतं सुखास्पदम् ॥ १४२ ॥
इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे हेमचूड़ोपाख्याने
वन्ध्याख्यायिका पञ्चमोऽध्यायः ।
मेरा साथ होनेपर वह तुरन्त ही मेरी माताके नगरमें आ गयी
और मेरी माताका पुनः पुनः आलिंगन करके निष्पाप हो गयी ॥१४०॥
फिर तो सहज ही में उसका आनन्दसमुद्रमें मग्न रहनेका
स्वभाव हो गया। हे नाथ ! इसी प्रकार आप भी मेरी सखीके दुराचारी
पुत्रका दमन करके अपनी मातासे भेंट कर नित्य सुख प्राप्त करें।
स्वामिन् ! यह मैंने अपने अनुभव किये हुए सुखस्थानका वर्णन किया
है ॥ १४१-१४२ ॥
पंचम अध्याय समाप्त ।
१. शुद्ध चित्स्वरूपमे स्थित हो गयी ।
२. वस' ३. शुद्धचिति ।