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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 404 में से

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पृष्ठ 93

षष्ठोऽध्यायः
एवं प्रियावचः श्रुत्वा हेमचूड़ोऽतिविस्मितः ।
हसन् पप्रच्छ तां कान्तामविद्वान् विदुषीं तदा ॥ १ ॥
प्रिये प्रोक्तं यदेतत्ते खचित्रमिव भाति मे ।
निरालम्बं················जानाम्येतदशेषतः ॥ २ ॥
नूनं तदप्सरोद्भूता ऋषिणा वर्द्धिता वने ।
संसृष्टयौवनाद्यापि न तारुण्यमलङ्कृता ॥ ३ ॥
वक्ष्यस्यनेकसाहस्रवर्षाणामिव संस्थितिम् ।
भूतग्रस्तोक्तिसदृशवचसा तेऽतिमात्रतः ॥ ४ ॥
असन्दर्भेण किमहं विबुद्ध्यामि यथार्थतः ।
वदते सा सखी क्वास्ते बद्धश्च सखि पुत्रकः ॥ ५ ॥
षष्ठ अध्याय ॥ ६ ॥
हेमचूड़का अविश्वास, हेमलता-द्वारा श्रद्धा-विश्वासकी प्रशंसा
अपनी प्रियतमाके ऐसे वचन सुनकर हेमचूड़को बड़ा विस्मय
हुआ । वह तत्त्वज्ञा है—यह बात वह नहीं जानता था । अतः उसने
हँसकर उससे पूछा ॥ १ ॥
“प्रिये ! तुमने जो कुछ कहा है वह मुझे आकाशमें भासते हुए
चित्रके समान जान पड़ता है । मैं तो इसे सर्वथा निराधार समझता
हूँ ॥ २ ॥
तुम्हारा जन्म उस अप्सरासे ही तो हुआ है, और ऋषिजीने तुम्हें
पाल-पोषके बड़ा किया है। अभी यौवनका तो तुम्हें स्पर्श ही हुआ है,
हाँ, तरुणाई ( किशोरावस्था ) पूरी हो चुकी है ॥ ३ ॥
तो भी तुम अपनी सहस्रों वर्षोंकी स्थिति बतला रही हो । तुम्हारी
बातोंसे तो तुम्हारा कथन बहुत-कुछ भूतग्रस्तोंका-सा जान पड़ता
है ॥ ४ ॥
तुम्हारे कथनका कोई मेल नहीं है, फिर मैं ठीक-ठीक क्या समझूँ ?
बताओ, तुम्हारी वह सखी कहाँ है और उसके द्वारा बाँधा हुआ उसका
पुत्र कौन है ? ॥ ५ ॥