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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 91

पञ्चमोऽध्यायः । ७७
एवं भूयोऽतिदुःखेन दुःखितं तनयेऽस्थिरे ।
सखी च मे दुःखमूढाऽभवद् दुःसङ्गता सदा ॥ १३५ ॥
स्वभावसत्त्वपि मृषा तामन्वहमपि प्रिय ।
मूढेवात्यन्तमभवं तत्कुटुम्बपरायणा ॥ १३६ ॥
को हि दुःसङ्गतः सौख्यं प्राप्नुयाल्लेशतः क्वचित् ।
गच्छन् मरुस्थले ग्रीष्मे तृष्णाशान्तिं ययौ नरः ॥ १३७ ॥
एवं चिरतरे काले संवृत्ते मम सा सखी ।
मोहितात्यन्तखेदेन मया रहसि सङ्गता ॥ १३८ ॥
मदेकसङ्गाद्युक्तिं सा प्राप्यासाद्य च सत्पतिम् ।
जित्वा स्वतनयं हत्वा बद्ध्वा तत्तनयादिकान् ॥ १३९ ॥
इस प्रकार दुःसंगमें पड़ी मेरी सखी अपने पुत्र अस्थिरके अत्यन्त
दुःखसे आतुर होनेपर स्वयं भी सर्वदा दुःखविमूढ रहने लगी ॥ १३५ ॥
प्रियतम ! मैं यद्यपि स्वभावसे तो शुद्ध थी, परन्तु उसके कुटुम्ब
की अनुगामिनी होनेके कारण उसके साथ व्यर्थ ही अत्यन्त मूढ-सी
हो गयी ॥ १३६ ॥
भला दुःसंगमें पड़कर ऐसा कौन है जो कभी सुख प्राप्त कर सके ?
ग्रीष्म ऋतुमें मरुस्थलमें जाकर भी क्या किसी व्यक्तिकी प्यास
बुझी है ? ॥ १३७ ॥
इस प्रकार बहुत समय बीत जानेपर जब मेरी वह सखी अत्यन्त
खेदसे खिन्न हो गयी तो एक दिन एकान्तमें मुझसे मिली ॐ ॥ १३८ ॥
एकमात्र मेरा ही संग होनेपर उसे जो युक्ति¹ मिली उससे उसने
एक सत्पति² प्राप्त किया । फिर [उसकी सहायतासे] उसने अपने पुत्र
अस्थिरको जीता तथा उसके पुत्रादिमेंसे किन्हींको³ मार डाला और
किन्हींको⁴ बाँध लिया ॥ १३९ ॥
ॐ 'एकान्त में' अर्थात् विषयावभाससे रहित हो 'मुझसे मिली' अर्थात् शुद्ध
चिदाकार हो गयी ।
१. वैराग्य । २. विवेक । ३. क्रोध और लोभको ।
४. पाँच ज्ञानेन्द्रियोंको ।