त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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क्वचिच्चपलायात्यन्तं चालितः खेदमीयिवान् ।
क्वचिन्महाशनाहेतोरशनाथें प्रधावति ॥ १२९ ॥
क्वचिज्ज्वालामुखाक्षिप्तो निर्दग्धापादमस्तकः ।
महामूर्च्छां समायाति चाविदंस्तत्प्रतिक्रियाम् ॥ १३० ॥
निन्द्यवृत्तं क्वचित् प्राप्य गर्हितो भर्त्सितः परैः ।
मृततुल्यं स्वमात्मानं मन्यते शोकसन्ततः ॥ १३१ ॥
दुष्टपत्नीपुत्रसहितो मोहितो दुष्कुलोद्भवः ।
पत्नीपुत्रैः समाक्रान्तो नीयमानस्तु तैः सदा ॥ १३२ ॥
उवास तैर्विचित्रेषु पुरेषूच्चावचेषु हि ।
क्वचित् कान्तारकीर्णेषु क्रव्यादाकुलभूमिषु ॥ १३३ ॥
क्वचिदत्यन्ततप्तेषु क्वचिच्छीतजडेषु च ।
क्वचित् पूतिवहास्थेषु क्वचिद्गाढतमःसु च ॥ १३४ ॥
कभी चपलाके कारण अत्यन्त चंचल होकर उसे महान् दुःख
मिलता, कभी महाशनाके कारण वह उसके भोगोंके लिये दौड़-धूप
करता रहता ॥ १२९ ॥
कभी ज्वालामुखकी लपेटमें आ जानेसे उसे एड़ीसे चोटीतक
ऐसा दाह होता कि घोर मूर्च्छा हो जाती और उसकी कोई चिकित्सा
भी न सूझती ॥ १३० ॥
कभी निन्द्यवृत्तका सम्पर्क होनेपर दूसरोंके द्वारा उसे निन्दा और
अपमान सहने पड़ते; जिनके कारण शोकाकुल होकर वह अपनेको
मृतकतुल्य ही समझता ॥ १३१ ॥
उन दुष्ट पत्नी और पुत्रोंके साथ वह दुष्ट कुलमें उत्पन्न हुआ
अस्थिर पत्नी और पुत्रोंसे घिरा तथा सर्वदा उन्हींके द्वारा ले जाया
जाता अनेकों प्रकारकी ऊँच-नीच पुरियोंमें रहा ॥ १३२-१३३ पू० ॥
कभी वह वनोंसे व्याप्त एवं मांसभक्षी जीवोंसे पूर्ण भूमियोंमें,
कभी अत्यन्त तप्त और कभी शीतसे ठिठुरा देनेवाले प्रदेशोंमें,
तथा कभी गन्दी नालियों और कभी घोर अन्धकारमें भटकता
रहा ॥ १३३ उ०-१३४ ॥