त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः । ७५
स एव माञ्च सङ्गम्य सर्वैः संयोजयत् पुरम् ।
मया संजीवितोऽत्यन्तं सूत्रधारो हि तत्पुरे ॥ १२३ ॥
जीर्णे तु तत्पुरे चान्यत् पुरं तान्नयति द्रुतम् ।
एवं प्रचारं संश्रित्य पुराणामधिपोऽभवत् ॥ १२४ ॥
बहूनामस्थिरो नूनं विचित्राणां क्रमेण वै ।
सतीपुत्रोऽप्यस्थिरः स संश्रितोऽपि महाबलम् ॥ १२५ ॥
मया च भावितोऽत्यन्तं सर्वथा दुःखभागभूत् ।
चपलामहाशनाभ्यां पत्नीभ्यां सुसमागमत् ॥ १२६ ॥
ज्वालामुखनिन्द्यवृत्ताभिधपुत्रयुगेन च ।
अन्यैः पुत्रैः पञ्चभिः स सर्वत्राभिविकर्षितः ॥ १२७ ॥
महाक्लेशपरीतात्मा सुखलेशविवर्जितः ।
इतस्ततः क्वचित् पुत्रैः पञ्चभिः स विकर्षितः ॥ १२८ ॥
हो जाते जैसे मालामें पिरोये हुए मनके तागा न रहनेपर बिखर जाते
हैं ॥ १२२ ॥
मेरे साथ मिलकर वह प्रचार ही सबके साथ उस पुरका संयोग
कराता है तथा मेरे द्वारा अनुप्राणित होकर वही उस पुरमें सबको
प्रेरित करनेवाला प्रधान सूत्रधार है ॥ १२३ ॥
जब वह नगर बहुत जीर्ण हो जाता है, तो वही उन सबको तुरन्त
दूसरे नगरमें ले जाता है। इस प्रकार प्रचारका आश्रय पाकर अस्थिर
क्रमशः तरह-तरहके अनेकों नगरोंका स्वामी हो गया ॥ १२४-१२५ पू० ॥
अस्थिर साध्वी माताका पुत्र था, उसे महाबली प्रचारका आश्रय
प्राप्त था और मेरे द्वारा भी उसका पोषण होता था, तथापि वह सब
प्रकार दुःखका ही भागी रहा ॥ १२५ उ०-१२६ पू० ॥
उसका चपला और महाशना दो पत्नियोंसे समागम रहा तथा
ज्वालामुख और निन्द्यवृत्त इन दो एवं अन्य पाँच पुत्रोंके द्वारा सब ओर
उसकी खींच-तान रही ॥ १२६ उ०-१२७ ॥
इससे उसका हृदय अत्यन्त क्लेशमें डूबा रहा, सुख तो लेशमात्र
भी उसे नहीं मिला। कभी तो उसके पाँचों पुत्र उसे इधर-उधर
घसीटते ॥ १२८ ॥