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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 371

द्वाविंशोऽध्यायः । ३५७
विधूय वासनां सत्यामुपैति ब्राह्मणोत्तम ।
ततो न बाधिता सत्यवासना भवति क्वचित् ॥ ४९ ॥
मध्यमस्य विस्मृतिर्नो न मिथ्या ज्ञानमेव च ।
अविस्मृतस्येच्छयैव मिथ्याज्ञानं क्वचिद्भवेत् ॥ ५० ॥
सिद्धस्यैषा स्थितिः प्रोक्ता साधकस्योच्यते शृणु ।
यथा यथा तत्परः स्यात्तथाऽविस्मृतिरुच्छ्रिता ॥ ५१ ॥
पूर्णस्य विस्मृतिर्नास्ति मिथ्याज्ञानं प्रयत्नतः ।
उत्तमस्य पुनर्ब्रह्मन् समाधिव्यवहारयोः ॥ ५२ ॥
न भेदो लेशतोऽप्यस्ति यतोऽविस्मरणं सदा ।
यः समाधिपरो मध्यस्तस्य याऽविस्मृतिः स्थिता ॥ ५३ ॥
सैषा म्लाना भवेन्मिथ्याज्ञानभूमिषु भूसुर ।
यस्तूत्तमोऽपि स्याच्छन्द्यात्प्रारब्धवशतोऽवि वा ॥ ५४ ॥
देता है और सत्य ज्ञानवासनाको प्राप्त कर लेता है। इसके पश्चात्
उसकी वह सत्यवासना फिर कभी बाधित नहीं होती ॥ ४८-४९ ॥
मध्यम ज्ञानीको सत्यवासनाकी विस्मृति नहीं होती और न मिथ्या
ज्ञान ही होता है। वह सत्यवासनाको बिना भुलाये ही कभी-कभी
स्वेच्छासे व्यवहारोपयोगी मिथ्या ज्ञानको स्वीकार कर लेता है ॥ ५० ॥
किन्तु यह स्थिति सिद्ध मध्यम ज्ञानीकी कही गयी है। अब
साधककी बतलाता हूँ, सुनो। साधक जैसे-जैसे आत्मानुसन्धानमें
तत्पर रहता है वैसे-वैसे उसे स्वरूपकी स्मृति बढ़ती जाती है।
पूर्ण होनेपर तो स्वरूपकी विस्मृति होती ही नहीं और मिथ्या द्वैतका
स्फुरण भी प्रयत्न करनेपर ही होता है ॥ ५१-५२ पू० ॥
ब्रह्मन् ! उत्तम ज्ञानीकी दृष्टिमें तो समाधि और व्यवहारका
लेशमात्र भी भेद नहीं होता, क्योंकि उसे स्वरूपकी स्मृति सदा ही
बनी रहती है ॥ ५२ उ०-५३ पू० ॥
जो समाधिनिष्ठ मध्यम ज्ञानी होता है उसे जो स्वरूपकी
अविस्मृति रहती है, हे ब्राह्मण ! वह तो मिथ्या अज्ञानकी स्थिति
आनेपर कुछ मन्द पड़ जाती है। किन्तु जो उत्तम ज्ञानी है वह