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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 372

३५८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
समाध्यतत्परो भूयात्तस्याम्लानैव चास्मृतिः ।
वस्तुतः शृणु भूदेव मध्यमोत्तमज्ञानिनाम् ॥ ५५ ॥
कर्म नैवास्ति यत्किञ्चिद्यतस्ते पूर्णतां गताः ।
संविदात्मातिरिक्तं यन्न ते पश्यन्ति किञ्चन ॥ ५६ ॥
कर्म शेषं कथं शिष्येद्यतः सर्वं चिदग्निना ।
भस्मीकृतमतस्तेषां न किञ्चित् परिशिष्यते ॥ ५७ ॥
ऐन्द्रजालिककर्मेव त्वितरैरेव दृश्यते ।
शृणु ब्रह्मन् रहस्यं ते प्रवक्ष्यामि समासतः ॥ ५८ ॥
शिवस्य यादृशी सैव ज्ञानिनां दृष्टिरुच्यते ।
नास्ति भेदो लेशतोऽपि सत्यमेतन्न संशयः ॥ ५९ ॥
तस्मान्न किञ्चित् कर्मापि ज्ञानिनामनुवर्त्तते ।
इति श्रुत्वा स वसुमान् हेमाङ्गदनिरूपितम् ॥ ६० ॥
सर्वसन्देहनिर्मुक्तो विज्ञानविशदाशयः ।
स्वेच्छासे अथवा प्रारब्धाधीन होनेपर भी यदि समाधिमें तत्पर न रहे तो
भी उसकी स्वरूपकी अविस्मृति मन्द नहीं पड़ती ॥ ५३ उ०-५५ पू० ॥
विप्रवर ! सुनो, वास्तवमें तो मध्यम और उत्तम ज्ञानियोंके
कुछ भी कर्म हैं ही नहीं, क्योंकि वे तो पूर्णताको प्राप्त हो जाते हैं ।
एक चिदात्माके सिवा वे और कोई वस्तु नहीं देखते ॥ ५५ उ०-५६ ॥
उनके किसी प्रकारके अवशिष्ट कर्म कैसे रह सकते हैं, क्योंकि
वे सब तो चेतनरूप अग्निसे भस्म हो गये हैं । अतः उनके कोई
भी कर्म शेष नहीं रहते ॥ ५७ ॥
मायावीके खेलके समान उनके कर्म तो दूसरोंको ही दिखाई
देते हैं । ब्रह्मन् ! सुनो, इसमें जो गूढ़ रहस्य है वह मैं संक्षेपमें
कहता हूँ ॥ ५८ ॥
जैसी दृष्टि शिवजीकी है वैसी ही ज्ञानियोंकी दृष्टि बतलायी
जाती है । उनमें लेशमात्र भी अन्तर नहीं है—यह बात निः-
सन्देह सत्य है । इसलिये वास्तवमें ज्ञानियोंका कुछ भी कर्म शेष
नहीं रहता ॥ ५६-६० पू० ॥
इस प्रकार हेमाङ्गदका तत्त्वनिरूपण सुनकर वसुमान् सब सन्देहों-