त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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अतो देहात्मभूतास्ते दृश्यसत्त्वविमर्शनाः ॥ ४२ ॥
मन्दज्ञानिभिरात्मा तु विदितः शुद्धचिन्मयः ।
जगच्चासत्यतो दृष्टं तथाप्यभ्यासमान्द्यतः ॥ ४३ ॥
प्राग्वासनाहृतज्ञानास्ते देहात्मप्रभासनम् ।
जगतः सत्यताभासं मध्ये मध्ये समाययुः ॥ ४४ ॥
भूयो ज्ञानवासना या विधुन्वन्त्यसतीं दृशम् ।
वासनैवं सत्यमिथ्याज्ञानयोश्च परस्परम् ॥ ४५ ॥
मिलिता मन्दज्ञानिनामतो मध्ये फलं स्फुटम् ।
समेऽपि वासने चैते न हि तुल्ये महीसुर ॥ ४६ ॥
सत्यज्ञानवासनया बाध्यते वासना परा ।
न च मिथ्या वासनया बाध्यते सत्यवासना ॥ ४७ ॥
मिथ्यावासनयाविष्टो विस्मृतः केवलां परः ।
ततो मिथ्यावासनां तु विनिश्चित्य भ्रमात्मिकाम् ॥ ४८ ॥
देहको ही आत्मा समझते हैं और दृश्यको भी सत्य ही मानते हैं ॥४२॥
मन्द ज्ञानियोंको शुद्ध चिन्मय आत्माका ज्ञान होता है और उन्हें
जगत् भी असत्य दिखायी देता है; तथापि अभ्यासकी कमीके कारण
पूर्व वासनाओंसे उनका ज्ञान दब जाता है और देह ही आत्मभावसे
भासने लगता है तथा बीच-बीचमें उन्हें जगत्की सत्यताका भान
भी हो जाता है ॥ ४३-४४ ॥
किन्तु उनके जो ज्ञानके संस्कार हैं वे पुनः उनकी इस
असत् दृष्टिको दूर कर देते हैं। इस प्रकार उनके सत्य और मिथ्या
ज्ञानके संस्कार परस्पर मिलकर बीच-बीचमें स्पष्ट फलका भोग
कराते हैं ॥ ४५-४६ पू० ॥
ब्रह्मन् ! यद्यपि ये दोनों ही संस्कार समानरूपसे आते रहते हैं,
तथा इनका प्रभाव एक-जैसा नहीं होता। ज्ञानकी वासना सत्यरूप
है, इसलिये उससे दृश्यकी मिथ्या वासना बाधित हो जाती है; किन्तु
दृश्यकी मिथ्या वासनासे सत्यवासना बाधित नहीं होती ॥४६ उ०-४७॥
विप्रवर ! जब वह मिथ्यावासनाके अधीन होकर शुद्ध वासनाको
भूल जाता है तो उस मिथ्यावासनाको भ्रमरूप निश्चय करके त्याग