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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 404 में से

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पृष्ठ 364

३५० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
भूयस्त्वदुक्त्या च सम्यग् विदितं परमं पदम् ।
किन्तु ते ज्ञाततत्त्वस्य कथं स्थितिरियं भवेत् ॥ ६ ॥
कथं ज्ञातसुविज्ञेयो व्यवहारपरायणः ।
ध्वान्तप्रकाशयोर्यद्वत् स्थितिरेकत्र सम्भवेत् ॥ ७ ॥
एतन्मे राजतनय ब्रूहि सम्यग् यथास्थितम् ।
इत्यापृष्टः प्राह हेमाङ्गदस्तं ब्राह्मणोत्तमम् ॥ ८ ॥
ब्रह्मन् ते भ्रान्तिरद्यापि न सम्यक् प्रविनाशिता ।
व्यवहारेण किं ज्ञानं बाध्यते स्वात्मसम्भवम् ॥ ९ ॥
व्यवहारवशाज्ज्ञानं बाध्यते च ततः कथम् ।
पुरुषार्थस्य लाभः स्यात् स्वप्नज्ञानसमेन वै ॥ १० ॥
सर्वोऽपि व्यवहारोऽयं ज्ञानमाश्रित्य सम्भवेत् ।
तज्ज्ञानं बाध्यते तेन कथं तन्मे समीरय ॥ ११ ॥
अब आपके कथनसे मुझे पुनः उस परम पदका अच्छी तरह
ज्ञान हो गया। किन्तु तत्त्वज्ञ होनेपर भी आपकी ऐसी स्थिति क्यों
होनी चाहिये ? ॥ ६ ॥
जिसने ज्ञेय तत्त्वको जान लिया है वह व्यवहारमें कैसे लगा रह
सकता है ? यह तो ऐसी ही बात होगी जैसे अन्धकार और प्रकाशकी
स्थिति एक जगह हो जाय ॥ ७ ॥
राजकुमार ! इसमें जो भी कारण हो वह मुझे ज्योंका त्यों
समझाकर कहिये।" ऐसा पूछा जानेपर हेमाङ्गदने उस विप्रश्रेष्ठसे
कहा—॥ ८ ॥
"ब्रह्मन् ! आपका भ्रम अभी अच्छी तरह निवृत्त नहीं हुआ है।
क्या अपने ही आत्मस्वरूपसे रहनेवाला ज्ञान व्यवहारसे बाधित हो
जाता है ? ॥ ९ ॥
यदि व्यवहारके कारण; ज्ञान बाधित हो जाय तब तो स्वप्नमें
होनेवाले ज्ञानके समान हुआ। उससे मोक्षरूप पुरुषार्थकी प्राप्ति कैसे
हो सकेगी ? ॥ १० ॥
यह सारा व्यवहार तो ज्ञानके आश्रयसे ही होता है। फिर उसीसे
वह बाधित कैसे हो जायगा—यह मुझे बताओ ॥ ११ ॥