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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 365

द्वाविंशोऽध्यायः । ३५१
ज्ञानं तदेव हि भवेद् यत्रेदं भासते जगत् ।
सङ्कल्पाद् व्यवहारो हि ज्ञाने सर्वं प्रकाशते ॥ १२ ॥
असङ्कल्पेन तद्रूपमनुलक्ष्य धिया सकृत् ।
कृतार्थो बन्धनिर्मुक्तो भवतीति सुनिश्चयः ॥ १३ ॥
तस्माद् ब्रह्मन् ते प्रश्नः सम्मतोऽयं सुबुद्धिभिः ।
पुनस्तं प्राह वसुमान् नृपसूनुं महाशयम् ॥ १४ ॥
सत्यं राजकुमारैतन्मयापीत्थं सुनिश्चितम् ।
स्वरूपं निर्विकल्पं हि संवेदनमिहोच्यते ॥ १५ ॥
सविकल्पत्वमापन्ने पुनर्भ्रान्तिः कुतो न हि ।
विकल्प एव हि भ्रान्तिर्यथा रज्जौ भुजङ्गमः ॥ १६ ॥
शृणु ब्रह्मन् न जानासि भ्रमाभ्रमविनिर्णयम् ।
गगने नीलिमा भाति गगनं जानतामपि ॥ १७ ॥
व्यवहारं च कुर्वन्ति नीलं नभ इति क्वचित् ।
जिसमें यह जगत् भास रहा है वही तो ज्ञान है । केवल संकल्पके
द्वारा ज्ञानमें ही तो सारे व्यवहारका भास होता है ॥ १२ ॥
हाँ, यह बात बिलकुल निश्चित है कि निःसंकल्प हो जानेसे बुद्धिके
द्वारा एक बार उस आत्मस्वरूपको लख लेनेपर जीव बन्धनसे मुक्त
होकर कृतार्थ हो जाता है ॥ १३ ॥
इसलिये ब्रह्मन् ! आपका यह प्रश्न श्रेष्ठ बुद्धिवालोंको मान्य नहीं
है ।” तब वसुमान्ने उस उदारचित्त राजकुमारसे पुनः कहा—॥ १४ ॥
“राजकुमार ! यह बात ठीक है और मैंने भी ऐसा ही निश्चय किया
है । वास्तवमें अपना निर्विकल्प स्वरूप ही शुद्धचिति कहा गया
है ॥ १५ ॥
किन्तु यदि वह विकल्पयुक्त हो जाय तो पुनः भ्रान्ति क्यों नहीं
होगी ? क्योंकि जैसे रज्जुमें सर्पका भ्रम होता है वैसे विकल्प ही तो
भ्रान्ति है” ॥ १६ ॥
[ राजपुत्र— ] “ब्रह्मन् ! सुनो, आप तो भ्रम और भ्रमहीनताका
निर्णय करना भी नहीं जानते । जो लोग आकाशको जानते हैं उन्हें
भी उसमें नीलिमा तो दिखायी देती ही है । और वे ‘आकाश नीला