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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 404 में से

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पृष्ठ 363

द्वांविशोऽध्यायः
श्रुत्वैवं राक्षसकथां रामो भृगुकुलोद्भवः ।
पुनः पप्रच्छावधूतकुलेशं प्रश्रयाश्रयः ॥ १ ॥
भगवन् किं तेन पृष्टं शापमुक्तद्विजेन वै ।
हेमाङ्गदेन किं प्रोक्तमेतन्मे कृपया वद ॥ २ ॥
कौतुक्यत्यन्तमत्राहं न तदल्पं भवेत् क्वचित् ।
इति पृष्टः पुनः प्राह दत्तात्रेयो दयापरः ॥ ३ ॥
राम तत्ते प्रवक्ष्यामि महार्थं तत् प्रभाषितम् ।
ततः पप्रच्छ वसुमान् हेमाङ्गदमुपस्थितम् ॥ ४ ॥
राजपुत्र किञ्चिदहं पृच्छामि त्वं समीरय ।
अहमष्टकयोगीशात्तद्ज्ञासिषमादितः ॥ ५ ॥
द्वांविशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
वसुमानका समाधान, ग्रन्थका सारांश
इस प्रकार राक्षसकी कथा सुनकर भृगुकुलमें अवतीर्ण श्रीपरशु-
रामजीने विनयावनत हो अवधूतशिरोमणि श्रीदत्तात्रेयजीसे पुनः
पूछा ॥ १ ॥
"भगवन् ! शापसे मुक्त हुए उस ब्राह्मणने क्या पूछा था और
हेमाङ्गदने उसका क्या उत्तर दिया, कृपापूर्वक यह मुझसे कहिये ॥ २ ॥
इस विषयमें मुझे बड़ा कौतूहल है, वह कोई छोटी बात कभी
नहीं हो सकती। ऐसा प्रश्न होनेपर श्रीदत्तात्रेयजीने दयालु होकर
पुनः कहना आरम्भ किया—॥ ३ ॥
"परशुराम ! वह सम्भाषण बड़े गम्भीर अर्थसे भरा हुआ है, मैं
तुम्हें सुनाता हूँ। तब वसुमान्ने समीप ही बैठे हुए हेमाङ्गदसे
पूछा—॥ ४ ॥
"राजपुत्र ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ, आप वर्णन करें।
आरम्भमें मैंने योगिराज अष्टकसे यह तत्त्व जाना था ॥ ५ ॥