त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशतितमोऽध्यायः। ३३६
निर्जितस्तेन वादेषु गृहीतो ब्रह्मरक्षसा ॥ ६४ ॥
रुक्माङ्गदोऽथ तं दृष्ट्वा प्राह हेमाङ्गदस्तु तम्।
भो ब्रह्मराक्षसैनं त्वं न भक्षयितुमर्हसि ॥ ६५ ॥
मां जित्वाऽवरजं ह्यस्य ततो नौ सह भक्षय।
हेमाङ्गदवचः श्रुत्वा प्रोवाच ब्रह्मराक्षसः ॥ ६६ ॥
चिराय लब्धो ह्याहारो बुभुक्षा मां प्रबाधते।
एतेन पारणां कृत्वा विवदामि त्वया सह ॥ ६७ ॥
ततस्त्वामपि निर्जित्य भक्षितेन त्वया ततः।
अत्यन्तं तर्पितो भूयामिति मे नृप निश्चयः ॥ ६८ ॥
चिरादेष वरः प्राप्तो वसिष्ठात्तु महात्मनः।
कदाचिदागतः शिष्यो वसिष्ठस्य तु भक्षितः ॥ ६९ ॥
देवराताभिधस्तेन शप्तस्तेन महात्मना।
इतः परं भक्षयित्वा मनुष्यं ब्रह्मराक्षसः ॥ ७० ॥
दग्धं भवेत्तव मुखमिति पश्चान्मया मुनिः।
वह भाईके सहित वहाँ जाकर उससे विवाद करने लगा ॥ ६३--६४ पू०॥
वादमें जीत लिये जानेपर रुक्माङ्गदको ब्रह्मराक्षसने पकड़ लिया।
यह देखकर हेमाङ्गदने उससे कहा, "ओ ब्रह्मराक्षस ! तुम इन्हें मत
खाओ। मैं इनका छोटा भाई हूँ। मुझे भी जीतकर फिर हम दोनों
हीको खा लेना" ॥ ६४ उ०-६६ पू० ॥
हेमाङ्गदकी बात सुनकर ब्रह्मराक्षसने कहा, "मुझे भूख सता रही
है। बहुत दिनोंमें यह आहार मिला है। अतः इसके द्वारा पारण करके
फिर तुम्हारे साथ विवाद करूँगा ॥ ६६ उ०-६७ ॥
फिर तुमको भी जीतकर जब खा लूँगा तो अत्यन्त तृप्त हो जाऊँगा।
राजन् ! ऐसा मेरा विचार है ॥ ६८ ॥
बहुत दिनोंसे महात्मा वसिष्ठसे मुझे ऐसा ही वर मिला हुआ है।
एक बार उनका देवरात नामक शिष्य यहाँ आया था, उसे मैं खा गया
तो उन्होंने मुझे शाप दिया—॥ ६६-७० पू० ॥
"ब्रह्मराक्षस ! अब आगे यदि तू किसी मनुष्यको खायगा तो तेरा