त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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स विपाशामनु पुरीमध्यासीदमृताभिधाम् ॥ ५७ ॥
तस्य पुत्रौ महात्मानौ स्थितावतिमनीषिणौ ।
रुक्माङ्गदहेमाङ्गदौ जनकस्यातिवल्लभौ ॥ ५८ ॥
तत्र रुक्माङ्गदो ह्यासीच्छास्त्राणां पारदर्शनः ।
हेमाङ्गदोऽतिविज्ञानी ज्ञानिनामुत्तमोऽभवत् ॥ ५९ ॥
तावुभौ निर्गतौ सर्वसेनाभिः परिवारितौ ।
मृगयार्थं वसन्तेषु ययतुर्गहनं वनम् ॥ ६० ॥
तत्रानेकान् मृगान् व्याघ्रान् शशकान् महिषानपि ।
हत्वाऽत्यन्तपरिश्रान्तावासाद्य ह्रदमास्थितौ ॥ ६१ ॥
तद्ध्रदस्य परे पारे न्यग्रोधे ब्रह्मराक्षसः ।
समस्तशास्त्रपारज्ञो विद्वद्भिर्विवदत्यलम् ॥ ६२ ॥
निर्जितान् भक्षयन्नास्ते चिरकालाद्धि भार्गव ।
रुक्माङ्गदश्चारमुखाग्निशम्य वादकौतुकी ॥ ६३ ॥
गत्वा तत्र आहूतस्तेन वादपङ्गेऽभवत् ।
वह विपाशा नदीके तीरपर अमृता नामकी पुरीमें रहता था ॥ ५७ ॥
उसके रुक्मांगद और हेमांगद नामक दो उदारचित्त एवं अत्यन्त
बुद्धिमान् पुत्र थे। वे अपने पिताको अत्यन्त प्रिय थे ॥ ५८ ॥
उनमें रुक्माङ्गद तो सम्पूर्ण शास्त्रोंमें अत्यन्त निपुण था और
हेमाङ्गद ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और आत्मदर्शी था ॥ ५९ ॥
वे दोनों सम्पूर्ण सेना के साथ नगरसे निकले और वसन्त ऋतुमें
मृगयाके लिये सघन वनमें चले गये ॥ ६० ॥
वहाँ उन्होंने अनेकों मृगों, व्याघ्रों, खरहों और भैंसोंका वध किया
तथा थककर एक सरोवरके तटपर आकर बैठ गये ॥ ६१ ॥
उस सरोवरके दूसरे तटपर वटवृक्षके ऊपर एक ब्रह्मराक्षस रहता
था। वह सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पारंगत था और विद्वानोंके साथ बहुत विवाद
किया करता था ॥ ६२ ॥
भृगुनन्दन ! वह जिन्हें विवादमें जीत लेता था उन्हें खा जाता था।
बहुत दिनोंसे उसका यही क्रम था। रुक्माङ्गदको भी वाद-विवादका
बड़ा कुतूहल रहता था। उसने जब जनोंके मुखसे यह समाचार सुना तो