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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 404 में से

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पृष्ठ 354

३४० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
भूयः सम्प्रार्थितो मह्यं प्रायच्छद्वरमुत्तमम् ॥ ७१ ॥
वादेषु निर्जितान् मर्त्यान् भक्षय त्वं समन्ततः ।
इति तद्वादविजितान् भक्षयामि ततस्त्वहम् ॥ ७२ ॥
चिराद्यैष मया प्राप्त आहारः सर्वतोऽधिकः ।
भक्षयित्वा ततो वादे त्वां विजेष्यामि भूमिप ॥ ७३ ॥
इत्युक्त्वा भक्षणोद्युक्तं पुनरहेमाङ्गदोऽब्रवीत् ।
ब्रह्मराक्षस मद्वाक्यं किञ्चिच्छृणु मया चितः ॥ ७४ ॥
अपि किञ्चित् प्राप्य चैनं परित्यजसि तद्वद ।
दत्त्वा तुभ्यं तदेनं तु मोचयामि सहोदरम् ॥ ७५ ॥
इत्युक्तः प्राह भूयस्तं नृपं स ब्रह्मराक्षसः ।
शृणु राजन्नास्ति तद्वै किञ्चिद्येनेनमुत्सृजे ॥ ७६ ॥
कः प्राणप्रियमाहारं त्यजेत् कालोपसङ्गतम् ।
किन्त्वेकः समयो मेऽस्ति प्रश्ना मे हृदि संस्थिताः ॥ ७७ ॥
तान्मे यदि प्रतिब्रूयास्तत्ते भ्रातरमुत्सृजे ।
मुँह जल जायगा।” फिर जब मैंने बहुत प्रार्थना की तो उन्होंने यह
उत्तम वर दिया ॥ ७० उ०-७१ ॥
“तुम शास्त्रार्थमें जीते हुए मनुष्योंको सभी जगह खा सकते हो।”
इसलिये तबसे मैं वादमें जीते हुए लोगोंको खा जाता हूँ ॥ ७२ ॥
अब बहुत समय बीतनेपर मुझे यह सबसे अच्छा आहार मिला
है। अतः राजन् ! इसे खाकर फिर मैं तुम्हें वादमें जीतूँगा” ॥ ७३ ॥
ऐसा कहकर जब वह रुक्मांगदको खानेके लिये उद्यत हुआ तो
हेमाङ्गदने कहा, “ब्रह्मराक्षस ! मेरी एक छोटी-सी बात सुन लो । बताओ,
क्या मेरे द्वारा दी हुई कोई वस्तु लेकर तुम इन्हें छोड़ सकते हो। मैं
तुम्हें वह वस्तु देकर अपने भाईको छुड़ा लूँगा” ॥ ७४-७५ ॥
ऐसा कहे जानेपर उस ब्रह्मराक्षसने राजासे कहा, “राजन् ! सुनो,
ऐसी कोई चीज नहीं है जिसके बदलेमें मैं इसे छोड़ दूँ ॥ ७६ ॥
भला, बहुत काल पश्चात् मिले हुए अपने प्राणप्रिय आहारको
कौन छोड़ना चाहेगा ? किन्तु मेरा एक प्रण है, मेरे हृदयमें कुछ
प्रश्न हैं। यदि तुम उनका उत्तर दे दोगे तो मैं तुम्हारे भाईको
छोड़ दूँगा ॥ ७७-७८ पू० ॥