त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पृष्ठ 351, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकविंशतितमोऽध्यायः ३३७
यथा रथेन व्यापारं कुर्वन्न रथदेहकः ॥ ५१ ॥
सारथिः स्यादेवमेव देहव्यापारतत्परः ।
न देही नापि व्यापारी शुद्धसंवेदनात्मकः ॥ ५२ ॥
अन्तरत्यच्छसुस्वान्तो बहिर्व्यवहरत्यसौ ।
यथा स्त्रीवेषितो नाट्ये द्वैरूप्यमुपसङ्गतः ॥ ५३ ॥
यथा क्रीडन् कुमारेण प्रौढस्तदोषवर्जितः ।
एवमेष जगत्क्रीडातत्परो निर्मलाश्यः ॥ ५४ ॥
मध्यज्ञानी निरोधस्य प्रकर्षेणाचलस्थितिः ।
अचलस्थितिरेतस्य विचारस्य प्रकर्षतः ॥ ५५ ॥
बुद्धेस्तु परिपाकेन मध्यमोत्तमयोर्भिदा ।
अत्र ते शृणु वक्ष्यामि संवादं ज्ञानिनोर्मिथः ॥ ५६ ॥
पुरा हि पर्वतेशोऽभूद्राजा रत्नाङ्गदाह्वयः ।
जिस प्रकार सारथी रथके द्वारा व्यापार करनेपर भी रथरूप नहीं
होता, उसी प्रकार उत्तम ज्ञानी देहसम्बन्धी व्यापारोंमें लगा रहनेपर
भी न तो देही होता है और न व्यापार करनेवाला, बस, शुद्ध ज्ञान-
स्वरूप ही रहता है ॥ ५१ उ०-५२ ॥
वह भीतरसे अत्यन्त निर्मल और स्वस्वरूपमें स्थित रहते हुए
ही ऊपरसे व्यवहार करता है, जिस प्रकार नाटकमें स्त्री-वेश धारण
करनेवाला पुरुष दो रूपोंमें स्थित रहता है ॥ ५३ ॥
अथवा जैसे बालकके साथ खेलनेवाला प्रौढ पुरुष उस खेलके
हार-जीत आदि दोषोंसे मुक्त रहता है, उसी प्रकार यह उत्तम ज्ञानी
लोकलीलामें लगा रहनेपर भी निर्मलचित्त रहता है ॥ ५४ ॥
मध्यम ज्ञानीकी तो निरोधकी अधिकताके कारण अविचल स्थिति
रहती है, किन्तु इस उत्तम ज्ञानीकी अचल स्थिति विचारकी उत्कृष्टताके
कारण होती है ॥ ५५ ॥
इस प्रकार बुद्धिकी परिपक्वताके तारतम्यसे ही उत्तम और
मध्यम ज्ञानियोंका अन्तर रहता है। इस विषयमें मैं तुम्हें दो ज्ञानियों-
का पारस्परिक संवाद सुनाता हूँ, श्रवण करो ॥ ५६ ॥
पूर्वकालमें पार्वत्य प्रदेशका रत्नांगद नामक एक राजा हुआ है