त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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शृणु राम प्रवक्ष्यामि रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ।
साधने न विभेदोऽस्ति ज्ञानं न चित्रसाधनम् ॥ ६ ॥
तारतम्यात् साधनानां फलप्राप्तिर्विभेदिता ।
पूर्णे तु साधने ज्ञानमनायासेन सिद्ध्यति ॥ ७ ॥
अपूर्चितारतम्येन त्वयासापेक्षणाद्भवेत् ।
वस्तुतः साधनं किञ्चिज्ज्ञानेनैवोपयुज्यते ॥ ८ ॥
ज्ञानं क्वचिन्नैव साध्यं सिद्धत्वात्तु स्वभावतः ।
चैतन्यमेव विज्ञानं तत् सदा स्वप्रकाशकम् ॥ ९ ॥
तत्र का साधनापेक्षा नित्याभानस्वरूपके ।
चैतन्यं निहितं चित्तकरण्डेऽतिसुनिर्मले ॥ १० ॥
अनन्तवासनापङ्कमग्नं नैवोपलक्ष्यते ।
निरोधसलिलैः सम्यग् वासनापङ्कमार्जने ॥ ११ ॥
परशुराम ! सुनो, मैं यह उत्तम रहस्य तुम्हें सुनाता हूँ ।
ज्ञानके साधनोंमें कोई भेद नहीं रहता । ज्ञान विभिन्न साधनोंवाला
नहीं है ॥ ६ ॥
किन्तु साधनोंकी न्यूनाधिकता रहनेके कारण उनकी फलप्राप्तिमें
अन्तर रहता है । साधन की पूर्णता होनेपर तो सहजहीमें ज्ञान प्राप्त
हो जाता है । और अपूर्णता रहनेपर उसकी न्यूनाधिकताके अनुसार
प्रयास करनेकी आवश्यकता पड़ती है ॥ ७-८ पू० ॥
वास्तवमें तो ज्ञानप्राप्तिके लिये साधनकी कोई आवश्यकता नहीं
होती, क्योंकि ज्ञान स्वभावसे ही सिद्ध होनेके कारण किसी साधनसे
प्राप्त होनेवाला नहीं है ॥ ८ उ०-९ पू० ॥
चैतन्य ही तो ज्ञान है और वह सदा ही स्वयंप्रकाश है ।
अतः उस नित्यप्रकाशस्वरूपकी उपलब्धिके लिये साधनकी क्या
आवश्यकता है ? ॥ ९ उ०-१० पू० ॥
यह चैतन्य चित्तरूप स्फटिकमणिकी अत्यन्त स्वच्छ पिटारीमें
रखा हुआ है । किन्तु अनन्तवासनाओंकी कीचड़में फँसा होनेके कारण
दिखायी नहीं देवा ॥ १० उ०-११ पू० ॥
अतः चित्तनिरोधरूप जलसे उस वासनाओंके कीचड़को धोना