त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः । २८६
विचारशितयन्त्रेण यत्नाच्चित्तकरण्डके ।
चिरात् संघटिते राम सुयुक्त्योद्घाटिते ततः ॥ १२ ॥
भासमानं तु मणिवच्चैतन्यमुपलभ्यते ।
राम तस्माद् वासनानां निरासे साधनं स्मृतम् ॥ १३ ॥
वासनाल्प्याधिक्यभावाद् बुद्धिस्तु विविधा भवेत् ।
यस्य यावद् वासनौघो बुद्धिमाच्छाद्य संस्थितः ॥ १४ ॥
साधनापेक्षं तस्य तावदेव भृगूद्वह ।
वासना विविधाः प्रोक्तास्तत्र मुख्या वदामि ते ॥ १५ ॥
अपराधकर्मकामभेदेन त्रिविधा हि सा ।
अश्रद्धैवापराधः स्यान्मुख्यः स्वात्मविनाशनः ॥ १६ ॥
विपरीतग्रहश्चापि ह्यपराधस्तु पौरुषः ।
प्रायः कलासु कुशला अपराधवशन्ननु ॥ १७ ॥
सत्सङ्गशास्त्रयोगैश्च परं तत्त्वं हि नो विदुः ।
पड़ता है । यह चित्तपेटिका बहुत दिनोंसे बन्द पड़ी हुई है । इसे
विचाररूप तीक्ष्ण यन्त्रके द्वारा बड़ी युक्तिसे खोलना पड़ता है । तब
वह चैतन्य मणिके समान दमकता हुआ दिखायी देने लगता है ।
इस प्रकार परशुरामजी ! साधनका उपयोग तो वासनाओंकी निवृत्तिमें
ही माना गया है ॥ ११ उ०-१३ ॥
वासनाओंकी न्यूनता और अधिकताके कारण बुद्धि अनेक प्रकारकी
होती है । जिसकी बुद्धिको जितने वासनाजालने ढक रखा है,
परशुराम ! उसको उतने ही साधनकी अपेक्षा होती है ॥ १४-१५ पू० ॥
वासनाएँ अनेक प्रकारकी कही गयी हैं । उनमेंसे मुख्य तुम्हें
बताता हूँ । वे अपराधवासना, कर्मवासना और कामवासना भेदसे
तीन प्रकारकी हैं ॥ १५ उ०-१६ पू० ॥
वेद-शास्त्रादिमें श्रद्धा न होना ही अपना नाश करनेवाला मुख्य
अपराध है ; तथा पुरुष (आत्मा) सम्बन्धी विपरीत धारणा होनी
दूसरा अपराध है ॥ १६ उ०-१७ पू० ॥
प्रायः जो लोग अनेक कलाओंमें कुशल हैं वे भी इन अपराधोंके
कारण संतसमागम और शास्त्रावलोकनके अवसर प्राप्त होनेपर भी
उस परमतत्त्वको नहीं जान पाते ॥ १७ उ०-१८ पू० ॥