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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 301

एकोनविंशोऽध्यायः
इति दत्तात्रेयमुखाच्छ्रुत्वा भार्गवनन्दनः ।
भूयः पप्रच्छ मुक्तानां व्यवहारक्रमं क्रमात् ॥ १ ॥
भगवन् भूय एतन्मे विस्तरेण निरूपय ।
यथा बुद्धिविभेदेन ज्ञानपाकविचित्रता ॥ २ ॥
ज्ञानन्त्वेकविधं स्वात्ममात्रभानात्मकं ननु ।
उपेयञ्च तदेव स्याद्यन्मोक्षस्तत्प्रथात्मकः ॥ ३ ॥
तत् कथं बुद्धिभेदेन पाकभेदसमाश्रयम् ।
साधनान्यपि भिद्यन्तेऽथवा नेति तदीरय ॥ ४ ॥
इति पृष्टः पुनस्तेन दत्तात्रेयो दयानिधिः ।
विस्तरेण तमेवार्थं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ५ ॥
एकोनविंश अध्याय ॥ १९ ॥
ज्ञानियोंकी स्थितियोंके भेद
श्रीदत्तात्रेयजीके मुखसे यह सब सुनकर भृगुनन्दन परशुरामने उनसे
क्रमशः मुक्तपुरुषोंकी व्यवहारपद्धतिके विषयमें पुनः प्रश्न किया ॥ १ ॥
भगवन् ! आप कृपा करके यह बात मुझे विस्तारपूर्वक फिर
समझाइये कि बुद्धिभेदके कारण ज्ञानियोंके ज्ञानकी परिपक्वतामें कैसे
अन्तर रह जाता है ॥ २ ॥
यह तो निश्चय है कि केवल अपने आत्माका भानरूप ज्ञान तो
सबको एक-सा ही होता है। तथा उस ज्ञानकी स्थितिरूप जो मोक्ष है
वही सबका लक्ष्य भी है ॥ ३ ॥
फिर बुद्धिभेदके कारण उसकी परिपक्वतामें रहनेवाला अन्तर क्यों ?
क्या उनके साधनोंमें भी कोई भेद रहता है या नहीं—यह सब
बताइये ॥ ४ ॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर दयानिधि भगवान् दत्तात्रेयने उसी बातको
पुनः विस्तारपूर्वक कहना आरम्भ किया ॥ ५ ॥