त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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अभावे भावविज्ञानमपि सम्भवति स्फुटम् ॥ १५० ॥
ततो न बाधितं सत्यमसत्यं बाधितं भवेत् ।
इति पक्षो न युक्तः स्यात् सर्वथा व्यभिचारतः ॥ १५१ ॥
चितोऽभाने न किञ्चित् स्यान्न स्यात्तदपि सर्वथा ।
तस्माद्यश्चिन्न भातीति वदेत् तार्किकसत्खरः ॥ १५२ ॥
स ब्रूयान्नाहमस्मीति तत्र केन किमुच्यते ।
यस्यात्मनि स्यात् सन्देहो भानाभावेन सर्वदा ॥ १५३ ॥
सोऽन्येषां नाशयेन्मोहं निपुणैस्तर्कगुम्फनैः ।
तदा गण्डशिलाप्येषाऽप्यन्यमोहं विनाशयेत् ॥ १५४ ॥
तस्मार्दथक्रियाभासमात्रेण न हि सत्यता ।
सर्वमेव हि विज्ञानं भ्रान्तिरेव न संशयः ॥ १५५ ॥
सकती है। और अभावमें भी स्पष्टतया भावरूपताकी अनुभूति हो
जाती है १ ॥ १५० ॥
इसलिये अबाधित सत्य होता है और बाधित असत्य—यह पक्ष
बिल्कुल ठीक नहीं है, क्योंकि इसका व्यभिचार भी देखा जाता
है ॥ १५१ ॥
यदि चेतनका भान न हो तब तो कुछ भी नहीं रहेगा। यहाँ
तक कि 'कुछ नहीं है' का भी भान नहीं होगा। इसलिये जो मूर्ख-
तार्किक कहता है कि चेतन नहीं भासता वह तो मानो कहता है
कि 'मैं नहीं हूँ'। ऐसी अवस्थामें किसके द्वारा क्या कहा जा रहा
है ॥ १५२-१५३ पू० ॥
अतः जिसे भान न होनेके कारण सर्वदा अपने अस्तित्वमें ही
सन्देह हो, वह तो कुशल तर्कके गुम्फन द्वारा [ अर्थात् शास्त्ररचना
करके ] अवश्य दूसरोंके अज्ञानको नष्ट कर देगा ! [ अर्थात् उसके
कथन द्वारा दूसरोंका अज्ञान कभी निवृत्त नहीं हो सकता।] ऐसी
अवस्थामें तो शायद यह पत्थरकी शिला भी दूसरोंका अज्ञान नष्ट कर
दे ॥ १५३ उ०-१५४ ॥
इसलिये जिसमें कार्यनिर्वाहकता प्रतीत हो उसकी इतने ही से
१. कई बार ऐसी भ्रान्ति हो जाती है कि जो वस्तु मौजूद है उसके न होनेका
ज्ञान होता है और जो नहीं है उसके होनेका अतः यह पक्ष निर्विवाद नहीं है।