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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 297

अष्टादशोऽध्यायः। २८३
परस्पराभावभासा अचिद्भावा हि सर्वथा।
चिद्भानं कदा कुत्र स्याद्राम प्रविचारय ॥ १४६ ॥
यदा चितिर्न भायाद्वै तदा भायात् कथं वद।
न भायाद्वा कथं भायादभाने यदि तद्द्वयोः ॥ १४७ ॥
राम भायादेव चितिस्तस्मात् सत्यैव सा चितिः।
राम सत्यासत्यभेदं शृणु संक्षेपतो ब्रुवे ॥ १४८ ॥
अन्यानपेक्षभासं स्यात् सत्यमन्यदसत्यकम् ।
अन्यथा रज्जुसर्पाद्यमपि सत्यं भवेन्ननु ॥ १४९ ॥
बाधो ह्यभावविज्ञानं तद्भावेऽपि हि सम्भवेत् ।
दृश्य पदार्थ सर्वथा अन्योन्याभावपूर्वक¹ ही भासते हैं। किन्तु
परशुराम ! विचार तो करो—भला, चेतनका अभाव कब और कहाँ
हो सकता है ? ॥ १४६ ॥
जब चेतनका भान न होगा तब उस 'तब' ( काल ) का भी
भान कैसे होगा ? यदि कहो कि नहीं होगा, तो उन काल और
चेतन दोनोंका अभान होनेपर उस अभानका भी भान कैसे होगा ?
[ क्योंकि काल और चेतनके अभानका भान भी तो चेतनके ही
प्रकाशमें हो सकता है । ] ॥ १४७ ॥
अतः परशुराम ! चेतन तो भासता ही रहता है, इसलिये वही
सत्य है । राम ! सत्य और असत्यका भेद संक्षेपसे सुनो, मैं बताता
हूँ ॥ १४८ ॥
जो दूसरेकी अपेक्षाके बिना भासे वह सत्य, अन्य सब असत्य ।
नहीं तो रज्जुमें कल्पित सर्पादि भी सत्य मानने होंगे² ॥ १४९ ॥
[ यदि बाध और अबाधको ही सत्यासत्यका निर्णय करनेमें हेतु
मानें तो— ] 'बाध' कहते हैं अभावानुभूति को । यह भावमें भी हो
१. जैसे घट और पट दो भिन्न पदार्थ हैं, इनका भान परस्पर एक-दूसरेके
अभावपूर्वक ही होगा । अर्थात् घटाभावके बिना पटका और पटाभावके बिना घटका
भान नहीं हो सकता ।
२. यदि सत्य और असत्यका ऐसा लक्षण न करके यह मानें कि जिसका बाध
या अभाव हो जाय वह असत्य और जिसका बाध या अभाव न हो वह सत्य—
तो प्रतीतिकालमें तो रज्जुमें कल्पित सर्पका भी न अभाव होता है और न बाध,
इसलिये उसे भी सत्य ही मानना होगा । अतः सबसे निर्दोष लक्षण वही है जो
यहाँ किया गया है ।