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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 296

२८२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
यथा जाग्रति वस्तूनां स्थिरतार्थक्रियापि च ।
दृश्यते किं तथा स्वप्ने दृश्यते न हि वा वद ॥ १४० ॥
न स्वप्ने जागरा भावाः स्वाप्ना वा नैव जागरे ।
अर्थक्रियाकरा वापि स्थिरा वा भान्ति तत्समम् ॥ १४१ ॥
विभावय सूक्ष्मदृशा को भेदोऽतीतस्वप्नयोः ।
पश्यैन्द्रजालिककृते स्थैर्यमर्थक्रियामपि ॥ १४२ ॥
किं तावतैव तत् सत्यमैन्द्रजालिकनिर्मितम् ।
सत्यासत्यविभागो वै प्राकृतैर्विदितो न हि ॥ १४३ ॥
अतएव मोहितास्ते प्रोचुः सत्यं हि जागतम् ।
कदाप्यभावसंस्पृष्टं सत्यं राम प्रचक्षते ॥ १४४ ॥
अभावः स्यादभानाद्वै त्वभानं न चितेः क्वचित् ।
अभानमचितामस्ति ह्यनेकत्वावभासतः ॥ १४५ ॥
जाग्रत्कालमें जिस प्रकार वस्तुओंकी स्थिरता और कार्यनिर्वाहकता
देखी जाती है, बताओ, क्या स्वप्नमें स्वप्नके पदार्थोंकी वैसी नहीं
देखी जाती ? ॥ १४० ॥
हाँ, स्वप्नमें जाग्रत्के पदार्थ और जाग्रत्में स्वप्नके पदार्थ न
तो कार्यनिर्वाहक जान पड़ते हैं और न स्थिर ही। सो, यह बात
दोनों अवस्थाओंमें समान ही है ॥ १४१ ॥
तुम सूक्ष्मदृष्टिसे विचार करो कि जाग्रत्की बीती हुई घटनाओंमें
और स्वप्नमें क्या भेद है ? देखो, जाग्रदवस्थामें ऐन्द्रजालिककी
बनायी हुई वस्तुओंमें स्थिरता भी रहती है और कार्यनिर्वाहकता भी ।
तो क्या इतनेसं ही उसकी बनायी हुई वे वस्तुएँ सत्य हो जाती
हैं ? ॥ १४२-१४३ पू० ॥
यह सत्य और असत्यका भेद साधारण पुरुषोंको मालूम नहीं है ।
इसीसे वे मोहवश कहते हैं कि जगत्के पदार्थ सत्य हैं ॥ १४३ उ०-१४४ पू० ॥
परशुराम ! सत्य तो वह है जिसे कभी अभावका स्पर्श नहीं होता ।
और अभाव तब होता है जब भान न हो । तो चितिका अभाव कभी
नहीं होता । और अभाव तो अचेतन दृश्य पदार्थोंका ही होता है, क्योंकि
उनमें अनेकता भासती है ॥ १४४ उ०--१४५ ॥