त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः। २७७
स एव तेषामात्मा स्याच्चिदानन्दघनात्मकः ।
एवं स्वकल्पिताकाशग्रस्तं यच्चिद्वपुः स्थितम् ॥ १०८ ॥
तदेव मन इत्युक्तमात्मैव न हि चेतरत् ।
तत्रावरणमुख्यत्वात् प्रमाणं मन उच्यते ॥ १०९ ॥
आवृतप्राधान्यतस्तु प्रमाता जीव उच्यते ।
एवमाकाशावृतोऽपि चिदात्मा भूय एव तु ॥ ११० ॥
आकाशे कोमलेऽत्यन्तशिथिले निर्घनेऽमले ।
कठिनश्लिष्टघनतामालिन्यानां प्रकल्पजैः ॥ १११ ॥
भूतान्याभास्य देहात्मा देहेनापि समावृतः ।
कुम्भोदरगतो दीप उदरं व्याप्य भासते ॥ ११२ ॥
एवमेष शरीरान्तरवभासनमात्रकः ।
आस्ते गूढप्रदीपात्मा तदन्तर्मात्रभासनः ॥ ११३ ॥
जिस प्रकार दूसरोंके शरीरोंमें जो आकाश प्रतीत होता है वही
उनका चिदानन्दघनस्वरूप आत्मा है और वही सर्वदा तुम्हारा
भी आत्मा है ॥ १०७ उ०-१०८ पू० ॥
इस प्रकार जो चैतन्यस्वरूप हमारे कल्पित आकाशसे व्याप्त
है वही 'मन' कहा गया है और वही आत्मा भी है, कोई अन्य
नहीं ॥ १०८ उ०-१०९ पू० ॥
आवरण करनेवाली जडशक्तिकी प्रधानतासे उसे प्रमाणरूप मन
कहते हैं और आवृत होनेवाली चित्शक्तिके प्राधान्यसे वही प्रमाता
जीव कहा जाता है ॥ १०९ उ०-११० पू० ॥
इस प्रकार आकाशसे आवृत हुआ भी चिदात्मा फिर पञ्चभूतोंसे
आवृत हो जाता है । आकाश अत्यन्त कोमल, शिथिल, विरल और
निर्मल है; किन्तु उसमें कठिनता, संश्लेष, सघनता और मलिनता-
की कल्पनासे पञ्चभूत प्रकट हो जाते हैं । इस प्रकार देहसे आवृत
होकर यह देहात्मा घड़ेके भीतर रखे हुए दीपककी तरह शरीरके
भीतर व्याप्त होकर प्रकाशित होने लगता है ॥ ११० उ०-११२ ॥
इस प्रकार यह आत्मा शरीरके भीतरी भागको ही प्रकाशित
करता है, जैसे घड़ेके भीतर रखा हुआ दीपक उसके भीतरी भागको
प्रकाशित किया करता है ॥ ११३ ॥