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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 290

२७६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे

सत्यप्यनेकवैचित्र्याभासनेन विभासते ।
तथा भासनकालेऽपि स्वरूपादनिवर्त्तनम् ॥ १०१ ॥
परिच्छेदावभासो यः सोऽनात्माभास उच्यते ।
साऽविद्या जडशक्तिः सा शून्यं प्रकृतिरेव च ॥ १०२ ॥
अत्यन्ताभाव आकाशस्तमः प्रथमसर्गकः ।
सर्वं तदेव संप्रोक्तं परिच्छेदनमादिमम् ॥ १०३ ॥
राम यः परिपूर्णात्मा विश्रमो वै समास्थितः ।
तस्यैकदेशताभ्रान्तिकृतमाकाशभासनम् ॥ १०४ ॥
अत आत्मप्रदेशो य आत्माभिमतिवर्जितः ।
आकाशः स हि सम्प्रोक्तः स हि संसारकारणम् ॥ १०५ ॥
एष एव भवेद्भेदः पशुदृष्ट्यैकगोचरः ।
राम सूक्ष्मदृशा पश्य य आकाशस्त्वयेक्ष्यते ॥ १०६ ॥
तत्रत्यजीवराशीनामात्मा चैतन्यमेव सः ।
यथान्यदेहेष्वाकाशो भासते यः सदा तव ॥ १०७ ॥


ही अनेकों विचित्र आभासोंके रूपमें भासने लगती है। और इस
प्रकार भासनेके समय भी अपने स्वरूपसे च्युत नहीं होती ॥१००-१०१॥
इसमें जो परिच्छेदोंकी प्रतीति होती है वही अनात्माभास कही
जाती है। तथा वही अविद्या, जडशक्ति, शून्य और प्रकृति भी
कहलाती है ॥ १०२ ॥
उसका वह प्रथम परिच्छेद ही अत्यन्ताभाव, आकाश, तप और
प्रथम सर्ग कहा जाता है ॥ १०३ ॥
परशुराम ! इसकी जो पूर्णाहन्तारूप विश्रान्ति है उसीमें एक-
देशताकी भ्रान्ति होनेसे आकाशका भान होने लगता है ॥ १०४ ॥
अतः आत्माका जो प्रदेश आत्माभिमान (अहंभाव) से रहित है
वही आकाश कहा जाता है और वही संसारका कारण है ॥ १०५ ॥
यह आकाश ही अज्ञानियोंकी दृष्टिसे दिखायी देनेवाला भेद है।
[और भेद ही संसारका मूल है, इसीसे इसे संसारका कारण कहा
है।] परशुराम ! तुम सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करो। तुम जो आकाश
देखते हो वही तो उसमें रहनेवाले जीवसमूहका चैतन्य आत्मा
है ॥ १०६-१०७ पू० ॥