त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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दीपप्रभा घटच्छिद्राद्यथा निर्याति वै बहिः ।
एवमक्षद्वारमुखाद् भूयो निर्याति वै चितिः ॥ ११४ ॥
निर्याणं तु चितेर्नास्ति पूर्णत्वादक्रियत्वतः ।
स्वात्मावरणमाकाशं स्फूत्तिंशक्तिश्चिदात्मनः ॥ ११५ ॥
यावन्निवारयेत्तावन्निर्याणं प्रतिभासते ।
मनोव्यापार एष स्यात् स्फूर्त्त्यापहतिरावृतेः ॥ ११६ ॥
तस्माद्राम मनो नान्यदात्मैव मन उच्यते ।
चला चितिर्मनोनाम्नी निश्चलात्मस्वरूपिणी ॥ ११७ ॥
आवृत्त्यमिहतिः स्फूर्त्या चलनं राम वै चितेः ।
एतदेव विकल्पः स्याद्विकल्पपरिवर्जने ॥ ११८ ॥
निर्विकल्पं पूर्णरूपं विज्ञानं मुक्तिनामकम् ।
राम त्यजात्र सन्देहं विकल्पस्य विवर्जने ॥ ११९ ॥
अप्यावरणदोषः स्यादिति नास्त्येव चावृतिः ।
आवृतिर्न हि सत्यास्ति यतः स्वेनैव कल्पिता ॥ १२० ॥
जिस प्रकार घड़ेके छिद्रोंमें होकर दीपकका प्रकाश बाहर
निकलता रहता है, उसी प्रकार फिर यह चिदात्मा इन्द्रियद्वारोंसे होकर
बाहर निकलने लगता है ॥ ११४ ॥
चेतन पूर्ण और अक्रिय है, इसलिये उसका कहीं आना-जाना नहीं
हो सकता । किन्तु जब चिदात्माकी चेतनशक्ति अपने आवरण आकाश-
को अलग करती है तो उसका निकलना भासने लगता है । चेतनके
द्वारा यह आवरणकी निवृत्ति ही मनका व्यापार है ॥ ११५-११६ ॥
इसलिये परशुराम ! मन कोई अन्य पदार्थ नहीं है, आत्मा ही
मन कहा जाता है । चलायमान चेतनका नाम मन है और निश्चल
चेतन आत्मस्वरूप है ॥ ११७ ॥
चितिशक्तिके स्फुरणद्वारा आवरणका हटना ही चेतनका चलन
है । यही विकल्प है । विकल्पका त्याग होनेपर जो निर्विकल्प पूर्ण
विज्ञान रहता है उसीका नाम मुक्ति है ॥ ११८-११९ पू० ॥
परशुराम ! तुम यह सन्देह त्याग दो कि विकल्पका त्याग होनेपर
भी आवरणदोष फिर हो सकता है; क्योंकि आवरण तो है ही नहीं