त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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आसाद्य यज्ञसदनं नृपं संयोज्य चाशिषा ॥ ३३ ॥
आक्षिपत्तत्र सभ्यांस्तु शृण्वताञ्च सभासदाम् ।
राजंस्ते यज्ञसदनमत्यन्तं नैव शोभते ॥ ३४ ॥
कमलाकरवत्काककङ्कवृन्दस्य सञ्चयात् ।
सभा विद्वत्समुदयैः क्षोमिनी शोभतेतराम् ॥ ३५ ॥
शारदं हंससंघातैः सपद्मं तु सरो यथा ।
तदत्र विद्याविशदं न पश्याम्येकमप्यलम् ॥ ३६ ॥
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि नात्र मे संस्थितिर्भवेत् ।
कथं सभामिमां मूर्खप्रचुरां संविशाम्यहम् ॥ ३७ ॥
एवं वारुणिना प्रोक्ताः सभ्याश्चक्रुधुरञ्जसा ।
किमरे द्विजबन्धो ! त्वमधिक्षिपसि सर्वतः ॥ ३८ ॥
केयं तवेदृशी विद्या यया सर्वे वयं जिताः ।
वृथा कत्थसि दुर्बुद्धे जित्वास्मांस्त्वं गमिष्यसि ॥ ३९ ॥
के लिये ब्राह्मणका वेष धारण कर जनकके यज्ञमें आया ॥३२ उ०-३३पू०॥
उसने यज्ञशालामें आकर राजाको आशीर्वाद दे सब सभासदोंको
सुनाते हुए उनपर आक्षेप किया, "राजन् ! यज्ञमण्डप तो विशेष
शोभित नहीं है, जिस प्रकार कौए और कंकसमुदायके इकट्ठे हो जानेसे
सरोवरकी शोभा नहीं होती ॥ ३३ उ०-३५ पू० ॥
सुन्दर सभाकी शोभा तो विद्वत्समुदायसे ही होती है, जैसे
कमलोंसे युक्त शरत्कालीन सरोवर हंससमूहसे ही सुशोभित होता
है ॥ ३५ उ०-३६ पू० ॥
सो, मुझे तो यहाँ एक भी विद्याविभूषित सदस्य दिखायी नहीं देता ।
तुम्हारा कल्याण हो, मैं तो जाता हूँ । यहाँ मेरा निर्वाह नहीं हो सकता ।
इस मूर्खबहुल सभामें मैं कैसे बैठ सकता हूँ ?” ॥. ३६ उ०-३७ ॥
वरुणपुत्रके इस प्रकार कहनेपर सभी सभासद स्वभावसे ही क्रोधमें
भर गये [ और बोले-] "अरे ब्राह्मणाधम ! तू सभीका अपमान कैसे
कर रहा है ? ॥ ३८ ॥
तुझमें ऐसी क्या विद्या है जिससे तू हम सभीको जीत सकता
है। मूर्ख ! तू व्यर्थ क्यों बकवाद करता है ? अब हमें जीतकर
ही जाना ॥ ३६ ॥