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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 227

पञ्चदशोऽध्यायः। २१३
प्रायो भूलोकसंस्थाना विद्वांसः सङ्गताः खलु ।
किं त्वं भूलोकमेवाद्य जेतुमिच्छसि दुर्मते ॥ ४० ॥
ब्रूहि का ते भवेद्विद्या यथाऽस्माञ्जेतुमिच्छसि ।
इत्युक्तवत्सु सभ्येषु वारुणिः पुनराह तान् ॥ ४१ ॥
समयेन विजेष्यामि सर्वान् वः क्षणमात्रतः ।
अहं जितो भवद्भिस्तु समुद्रे स्यान्निमज्जितः ॥ ४२ ॥
युष्मास्त्वहं मज्जयामि जितं जितमथापि वा ।
उपेत्यैवं तु समयं विवदन्तु मया सह ॥ ४३ ॥
इत्युक्त्वा सम्मतिं चक्रुः सभ्या वादाय तेन तु ।
विवादं चक्रुरत्यन्तं तेन वारुणिना द्विजाः ॥ ४४ ॥
जिग्ये वारुणिर्विप्रान् वितण्डाजल्पवर्त्मना ।
सिन्धौ निमज्जिता विप्राः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४५ ॥
निमज्जितास्तु ये विप्रा दूतैस्तैर्वारुणैर्हृताः ।
यहाँ भूमण्डलके प्रायः सभी विद्वान् एकत्रित हुए हैं। क्यो रे दुर्बुद्धि !
क्या तू अकेला ही सारे भूलोकको जीतना चाहता है ॥ ४० ॥
बोल, तेरी वह क्या विद्या है, जिससे तू हमें जीतनेकी इच्छा
करता है।" सभासदोंके ऐसा कहनेपर वरुणपुत्रने उनसे कहा-॥ ४१ ॥
“मैं एक शर्त करके तुम सभीको क्षणमात्रमें जीत सकता हूँ।
यदि तुमलोग मुझे जीत लो तो मुझे समुद्र में डुबो देना। नहीं तो
तुममेंसे जिस-जिसको मैं परास्त करूँगा उसे डुबा दूँगा। इस शर्तको
स्वीकार करो, फिर मेरे साथ विवाद कर सकते हो" ॥ ४२-४३ ॥
इस शर्तको स्वीकार कर सभी सभासदोंने उसके साथ विवाद
करनेका निर्णय किया। और उन सभी ब्राह्मणोंने उस वरुणपुत्रके साथ
खूब शास्त्रार्थ किया ॥ ४४ ॥
वरुणपुत्रने वितण्डा¹ और जल्प²के द्वारा सभी ब्राह्मणोंको जीत लिया।
और इस प्रकार उसने सैकड़ों-हजारों ब्राह्मणोंको समुद्रमें डुबा दिया ॥४५॥
उन डुबाये हुए ब्राह्मणोंको वरुणके दूत ले जाते थे और
१. अपना कोई पक्ष स्थापित न करते हुए केवल दूसरेके पक्षका खण्डन करना ।
२. अपने पक्षको स्थापित करते हुए दूसरेके पक्षका खण्डन करना ।