त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः । २११
यथा स्वप्ननिधिप्राप्तिः पुरुषाणां निरर्थिका ।
तथा तटस्थविज्ञानममुख्यफलदं भवेत् ॥ २७ ॥
अत्र ते कथयिष्यामि प्राग्वृत्तमतिशोभनम् ।
पुरा विदेहेषु कश्चिदासीद्राजा सुधार्मिकः ॥ २८ ॥
वृद्धप्रज्ञो हि जनकः प्रविज्ञातपरावरः ।
स कदाचित्स्वात्मदेवीमीजे क्रतुभिरुत्तमैः ॥ २९ ॥
तत्राजग्मुर्ब्राह्मणाद्या विद्यावन्तस्तपस्विनः ।
कलाभिज्ञा वैदिकाश्च यज्वानश्चापि सत्रिणः ॥ ३० ॥
तत्काल एव वरुणो यष्टुं समुपचक्रमे ।
तेनोपहूता विप्राद्या न ययुस्तत्र भूरिशः ॥ ३१ ॥
जनके ह्यभिसंप्रीताः पूजितास्तेन तर्पिताः ।
अथाजगाम वरुणदायादो बौद्धसम्पदा ॥ ३२ ॥
विप्रवेषधरो नेतुं ब्राह्मणान्कूटवर्त्मना ।
निवृत्त हो जाती है। उसे तटस्थरूपसे जानना तो स्वप्नज्ञानके
समान है ॥ २५ उ०-२६॥
जिस प्रकार स्वप्नमें खजानेको पा लेना मनुष्यके किसी काम
नहीं आता, उसी प्रकार तटस्थ ज्ञान मनुष्यको मोक्षरूप मुख्य फल
नहीं दे सकता ॥ २७ ॥
अब मैं तुमसे एक अति सुन्दर प्राचीन वृत्तान्त कहता हूँ। पूर्व-
कालमें विदेह-राज्यमें जनक नामका कोई धर्मनिष्ठ और बुद्धिमान राजा
था । उसे परमात्माका ज्ञान हो चुका था ॥ २८-२९ पू० ॥
उसने किसी समय उत्तम यज्ञों द्वारा अपने आत्मदेवकी आरा-
धना की। उसके यज्ञोंमें अनेकों विद्वान् और तपस्वी ब्राह्मणादि पधारे।
वे अनेकों कलाओंके ज्ञाता, वेदज्ञ, यजनशील और सत्रोंका अनुष्ठान
करनेवाले थे ॥ २९ उ०-३० ॥
उसी समय वरुणने भी यज्ञ आरम्भ किया। उसके निमन्त्रित
करनेपर भी अनेकों ब्राह्मणादि, जनकसे अधिक प्रेम हो जाने और उससे
पूजित तथा तृप्त होनेके कारण वहाँ नहीं गये ॥ ३१-३२ पू० ॥
तब वरुणका पुत्र अपने बुद्धिवैभवसे कूटमार्गद्वारा ब्राह्मणोंको ले जाने-