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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 404 में से

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पृष्ठ 21

प्रथमोऽध्यायः। ७
अहो यथान्धानुगतो ह्यन्धश्चेष्टति तादृशः।
लोकस्य व्यवहारो वै सर्वस्याप्यभिलक्षितः ॥ ३४ ॥
निदर्शनं ह्यात्मकृतिरत्र मे सर्वथा भवेत् ।
नूनं मम शैशवे किं जातं तन्मे न भावितम् ॥ ३५ ॥
कौमारे चान्यथा वृत्तं तारुण्येऽपि ततोऽन्यथा।
इदानीमन्यथैवास्ति व्यापारो मम सर्वथा ॥ ३६ ॥
किम्भूतफलमेतेषां तन्न वेद्मि कथञ्चन।
यद्यत्काले यच्च यच्च क्रियते येन येन वै ॥ ३७ ॥
सम्यगेवेति तद्बुद्ध्या फलावष्टम्भपूर्वकम् ।
फलं किं तत्र सम्प्राप्तं केन वा सुखमात्मनः ॥ ३८ ॥
यच्चापि लोके फलवदविमृश्यफलं हि तत् ।
न फलं तदहं मन्ये पुनर्यस्मात्करोति सः ॥ ३९ ॥
सकता है ? संसारका यह सारा व्यवहार मुझे बड़ा ही विचित्र जान
पड़ता है। इसमें विचार कुछ भी नहीं जान पड़ता ॥ ३३ ॥
अजी, जैसे अन्धेके पीछे चलनेवाला अन्धा भी उसी ओर चलाँ
जाता है वैसे ही यह सम्पूर्ण लोकका व्यवहार दिखायी देता है ॥ ३४ ॥
[ औरोंके विषयमें क्या कहा जाय ] इस विषयमें मेरे लिये
अपना व्यवहार ही पूरा दृष्टान्त है। अवश्य ही, बचपनमें क्या हुआ,
सो तो मुझे स्मरण नहीं है ॥ ३५ ॥
किन्तु कुमार-अवस्था में मेरा दूसरा ही व्यवहार था और युवावस्था में
उससे सर्वथा भिन्न तथा अब मेरा आचरण उससे भी एकदम
निराला है ॥ ३६ ॥
किन्तु उन आचरणोंका फल क्या हुआ यह मैं कुछ नहीं जानता।
जिस-जिस व्यक्तिके द्वारा जिस-जिस समय जो-जो कर्म 'यह उचित ही
है' ऐसा समझकर फलको सामने रखते हुए किया जाता है, उनमेंसे
किसीको क्या कोई फल मिला ? क्या कोई सुखी हुआ ? ॥ ३७-३८ ॥
लोकमें जो फल-जैसा जान पड़ता है वह अविचार-दृष्टि से ही
फल है। मैं उसे फल नहीं मानता, क्योंकि फिर भी तो वह फलप्राप्तिके
लिये उद्योग करता ही है ॥ ३६ ॥