त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पृष्ठ 22, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
प्राप्ते फले फलेच्छावान् पुनर्भूयात्कथं वद ।
यस्मान्नित्यं करोत्येव जनः सर्वः फलेहया ॥ ४० ॥
फलं तदेव सम्प्रोक्तं दुःखहानिः सुखञ्च वा ।
कर्त्तव्यशेषे नो दुःखनाशो वा सुखमेव वा ॥ ४१ ॥
कर्त्तव्यतैव दुःखानां परमं दुःखमुच्यते ।
तत्सत्त्वे तु कथन्ते स्तो दुःखाभावः सुखञ्च वा ॥ ४२ ॥
यथा दग्धाखिलाङ्गस्य पादे पाटीरलेपनम् ।
तथा कर्त्तव्यशेषस्य सुखलाभ इहोच्यते ॥ ४३ ॥
यथा शराविद्धहृदः परिष्वङ्गोऽप्सरोगणैः ।
तथा कर्त्तव्यशेषस्य सुखलाभ इहोच्यते ॥ ४४ ॥
यथा क्षयामयाविष्टनरस्य गीतसंस्तुतिः ।
तथा कर्त्तव्यशेषस्य सुखलाभ इहोच्यते ॥ ४५ ॥
यदि फल प्राप्त हो गया तो बताओ, वह पुनः फलकी इच्छावाला
क्यों होता है ? तथापि सब लोग फलकी कामनासे कर्म करनेमें लगे
ही रहते हैं ॥ ४० ॥
वास्तवमें फल तो उसीको कहा जाता है जिससे दुःखकी निवृत्ति
और सुखकी प्राप्ति हो जाय । जबतक कर्म करना शेष है तबतक न
तो दुःखकी निवृत्ति कही जा सकती है और न सुखकी प्राप्ति ॥ ४१ ॥
वास्तवमें कर्त्तव्यता ही सम्पूर्ण दुःखोंमें सबसे बड़ा दुःख कहा
जाता है । जबतक वह बनी हुई है तबतक तुझे दुःखकी निवृत्ति और
सुखकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? ॥ ४२ ॥
जिस प्रकार किसीका सारा शरीर झुलस जाय और उसके पैरपर
चन्दनका लेप किया जाय, उसी प्रकार जिसका कर्त्तव्य शेष है उसे
सुखकी प्राप्ति बताना है ॥ ४३ ॥
जैसे किसीका वक्षःस्थल बाणोंसे विदीर्ण हो गया हो और फिर
अप्सराएँ उसका आलिंगन करें, वैसे ही जिसका कर्त्तव्य शेष है उसे
सुखकी प्राप्ति बताना है ॥ ४४ ॥
अथवा जैसे कोई पुरुष क्षयरोगसे ग्रस्त हो और उसकी संगीत-
द्वारा स्तुति की जाय, वैसे ही जिसका कर्त्तव्य शेष है उसे इस लोकमें
सुखकी प्राप्ति बतलाना है ॥ ४५ ॥