त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
विस्मृतश्च मया यस्मात्प्राङ् न पृष्टं गुरुं प्रति ।
माहात्म्यं त्रिपुराशक्तेः श्रुतं श्रीगुरुवक्त्रतः ॥ २८ ॥
परन्तु तन्न विदितं यत्संवर्त्तः पुराऽब्रवीत् ।
मया सृष्टिप्रसङ्गेन पृष्टं किञ्चिद्गुरुं प्रति ॥ २९ ॥
तदा कटकृदाख्यानं वर्णयित्वा च मे गुरुः ।
नाब्रवीदप्रकृततस्तन्मे तत्तादृशं स्थितम् ॥ ३० ॥
लोकस्य गतिमेतान्तु न जानाम्यपि लेशतः ।
कस्मादिदं समुदितं जगदाडम्बरं महत् ॥ ३१ ॥
कुत्र वा गच्छति पुनः कुत्र संस्थानमृच्छति ।
अस्थिरन्तु प्रपश्यामि सर्वं सर्वत्र किञ्चन ॥ ३२ ॥
व्यवहारः स्थिरप्रायः कस्मादेतदपीदृशम् ।
चित्रां जगत्प्रवृत्तिं प्रपश्याम्यविमर्शिनीम् ॥ ३३ ॥
फिर मैं उसे भूल गया, इसलिये गुरुजीसे भी नहीं पूछा। हाँ,
गुरुदेवके मुखारविन्दसे मैंने भगवती त्रिपुराका माहात्म्य अवश्य
सुना ॥ २८ ॥
परन्तु जो बात पहले संवर्तजीने कही थी वह मुझे तब भी मालूम
नहीं हुई। मैंने गुरुजीसे भी सृष्टिके प्रसंगमें कुछ पूछा तो
अवश्य था ॥ २९ ॥
तब उन्होंने इसे कटकृत् आख्यान¹ बतलाकर अप्रासंगिक होनेके
कारण इस विषयमें कुछ भी नहीं कहा और यह बात वहीं रह गयी ॥३०॥
किन्तु मुझे लोककी इस गति-विधिका लेशमात्र भी ज्ञान नहीं
है। यह इतना बड़ा विश्वप्रपञ्च कहाँ से खड़ा हो गया ॥ ३१ ॥
कहाँ यह जा रहा है और कहाँ जाकर स्थिर होगा। जहाँ भी जो
कुछ है वह सभी मुझे अस्थिर दिखायी देता है ॥ ३२ ॥
[ और जब सभी पदार्थ अस्थिर हैं तब उनके आश्रित रहनेवाला
'यह मेरा है, यह तेरा है' ] इस प्रकारका व्यवहार भी कैसे स्थिर हो
१. 'कटकृत्' कहते हैं चटाई बुननेवालेको। वे चटाई बुनते हुए जैसे जहाँ-
वहाँकी अनेकों अप्रासंगिक बातें करते रहते हैं उसी प्रकार प्रस्तुत विषय न होनेके
कारण उस समय श्रीदत्तात्रेयजीने सृष्टिविषयक चर्चाको 'कटकृत् आख्यान' कहा ।