त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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सङ्कल्प एव स्वातन्त्र्यं चितेरुच्छूनमीर्यते ।
असङ्कल्पदशायां सा चितिः स्वच्छैकरूपिणी ॥ ६६ ॥
एवं चितेर्विशुद्धैकरूपायाः सृष्टिः पुरा ।
बृहत्स्वातन्त्र्यमभवत्सङ्कल्पात्मकमेव तत् ॥ ६७ ॥
तत एतत्समाभातं प्रतिबिम्बात्मकं जगत् ।
बृहत्सङ्कल्पसुस्थैर्याच्चिरमेतद्विभासते ॥ ६८ ॥
साधारणं जगद्भाति पूर्णस्वातन्त्र्यहेतुतः ।
अन्येषां तदपूर्णत्वाद्भात्यसाधारणात्मना ॥ ६९ ॥
अभ्यासान्मणिमन्त्राद्यैः स्वातन्त्र्यं तु यथा यथा ।
त्यजेत्सङ्कोचमात्मस्थं तथा तत्र हि भासनम् ॥ ७० ॥
पश्यैन्द्रजालिकं राम निरुपादानयोगतः ।
भासयन्तं जगच्चित्रं सङ्कल्पादेव सर्वतः ॥ ७१ ॥
संकल्परूप स्वातन्त्र्य ही उस चितिका स्थूल रूप कहा जाता है।
जब संकल्प नहीं होता उस अवस्था में तो वह शुद्ध चिन्मात्ररूपिणी
ही है ॥ ६६ ॥
इस प्रकार सृष्टिसे पूर्व एकमात्र शुद्धस्वरूपिणी चितिमें जो परम
स्वातन्त्र्य था वही सृष्टिके आरम्भमें संकल्परूप हो गया ॥ ६७ ॥
उसीसे यह प्रतिबिम्बरूप जगत् भासने लगा । वह महान् संकल्प
बहुत स्थिर है, इसीसे यह चिरकालतक भासता रहता है ॥ ६८ ॥
चितिके पूर्ण स्वातन्त्र्यके कारण यह जगत् सबको समानरूपसे
प्रतीत होता है । अन्य जीवोंका स्वातन्त्र्य तो पूर्ण नहीं है, इसलिये
उनके संकल्पसे भासनेवाली वस्तुएँ असाधारणरूपसे केवल उन्हें ही
प्रतीत होती हैं ॥ ६९ ॥
अभ्यास, मणि अथवा मन्त्र आदिके प्रभावसे जैसे-जैसे उनकी-
स्वतन्त्रता बढती जाती है वैसे-वैसे ही उनके अन्तःकरणमें भासनेवाले
पदार्थोंकी प्रतीतिमें भी संकोचकी कमी होने लगती है ॥ ७० ॥
परशुराम ! देखो, एक ऐन्द्रजालिक (मायावी) कोई सामग्री न
रखते हुए भी केवल अपने संकल्पसे नया संसारचित्र दिखा देता
है ॥ ७१ ॥