त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः। १५७
साधारणं स्थिरं स्वार्थक्रियार्हं भूय एव तु ।
स्वात्मन्युपसंहरेच्च जगदेवं विभासते ॥ ७२ ॥
योगिनः पश्य सृष्टिं तां पूर्णस्थैर्यसमावृताम् ।
योगिनस्तु मितत्वेन सृष्टिर्बाह्या विभाविता ॥ ७३ ॥
अमितत्वात्सृष्टिरियं चिन्नाथस्यान्तरेव हि ।
अत एव चिदात्मत्वव्यतिरेकादसत्यता ॥ ७४ ॥
जगतः प्रतिबिम्बस्यादर्शात्मत्वं विना यथा ।
अत एव विचारेणासत्यतां याति नान्यथा ॥ ७५ ॥
सत्यं स्वभावं नो मुञ्चेदसत्यं तं परित्यजेत् ।
जगत्पश्य भार्गवैतत् स्वभावादतिचञ्चलम् ॥ ७६ ॥
सत्यासत्ये विभागेन भासेते सर्वतोऽखिलम् ।
प्रतिबिम्बादर्शभानमिव तत्प्रविचारय ॥ ७७ ॥
वह सबको दिखायी देता है, स्थिर जान पड़ता है, तथा सच्ची
वस्तुओंके समान उससे व्यवहार भी हो सकता है । फिर अपने
में ही उसे लीन भी कर लेता है । इसी प्रकार यह संसार भी भास
रहा है ॥ ७२ ॥
योगियोंकी मनःकल्पित सृष्टिको देखो । वह तो पूर्ण स्थिरतासे
युक्त होती है । किन्तु योगियोंका स्वरूप सीमित होता है, इसलिये
उनकी सृष्टि उनसे बाहर भासती है ॥ ७३ ॥
परन्तु चिन्मात्र परमेश्वरका स्वरूप तो असीम है, इसलिये उनकी
यह सृष्टि उनके भीतर ही है । अतः प्रतिबिम्ब जैसे दर्पणस्वरूप ही
होता है वैसे ही चिदात्मासे भिन्न इस जगत्की कोई सत्ता नहीं है ।
इस प्रकार केवल विचारसे ही इसकी असत्यता सिद्ध होती है, और
किसी प्रकार नहीं ॥ ७४-७५ ॥
परशुरामजी ! सत्य कभी अपने स्वभावको नहीं छोड़ता और
असत्य उसे त्याग देता है । देखो, यह जगत् तो स्वभावसे बहुत ही
चंचल है ॥ ७६ ॥
सब प्रकारके सत्य और असत्य दर्पण और प्रतिबिम्बके [ स्थिर
और चंचल ] भानोंकी तरह अलग-अलग प्रतीत होते हैं । तुम उनका
विचार करो ॥ ७७ ॥