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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

एकादशोऽध्यायः। १५५
प्रतिबिम्बस्वरूपज्ञाः प्रतिबिम्बं प्रचक्षते ।
जगदेतादृशं सर्वं सर्वैः समभिलक्षितम् ॥ ६० ॥
स्वतो न भासते क्वापि भासते च चिदाश्रयात् ।
अतो जगत्स्यादादर्शप्रतिबिम्बसुसंमितम् ॥ ६१ ॥
चितिर्विचित्राऽन्यभावैरूपरक्तापि भासिनी ।
स्वरूपादप्रच्युतैवाऽऽदर्शवल्लेशतोऽपि हि ॥ ६२ ॥
दर्पणप्रतिबिम्बानां दर्पणानन्यता यथा ।
चिदात्मप्रतिबिम्बानां चिदात्मानन्यता तथा ॥ ६३ ॥
दर्पणे प्रतिबिम्बो हि बिम्बहेतुर्निरूपितः ।
चितेः स्वातन्त्र्यहेतुः स्यात्प्रतिबिम्बो हि जागतः ॥ ६४ ॥
स्वसङ्कल्पाद्राम पश्य स्वात्मनि प्रतिबिम्बितान् ।
भावान् बिम्बविनाभूतान्निर्निमित्तावभासनान् ॥ ६५ ॥
प्रतीति हो, उसीको प्रतिबिम्बका स्वरूप जाननेवाले 'प्रतिबिम्ब' कहते
हैं। यह सम्पूर्ण जगत् सबको ऐसा ही जान पड़ा है ॥ ५६ उ०-६० ॥
यह स्वयं कभी नहीं भासता, चेतनके आश्रयसे ही भासता
है। इसलिये यह जगत् दर्पणमें प्रतीत होनेवाले प्रतिबिम्बके समान
है ॥ ६१ ॥
इसे प्रकाशित करनेवाली चिति बड़ी विचित्र है। वह अन्य
भावोंसे उपरञ्जित (रँगी हुई) रहनेपर भी दर्पणके समान अपने
स्वरूपसे लेशमात्र भी च्युत नहीं होती ॥ ६२ ॥
दर्पणके प्रतिबिम्बोंका जिस प्रकार दर्पणसे अभेद रहता है उसी
प्रकार चिदात्मा में प्रतिबिम्बित पदार्थोंका भी चिदात्मासे अभेद
है ॥ ६३ ॥
दर्पणमें जो प्रतिबिम्ब पड़ता है उसका हेतु बिम्ब कहा जाता है,
किन्तु यह जगत्-रूप प्रतिबिम्ब चितिकी स्वतन्त्रताके कारण पड़ता
है ॥ ६४ ॥
परशुराम ! तुम स्वयं अनुभव करके देखो; तुम्हारे संकल्पसे बिम्ब-
के बिना ही तुम्हारे अन्तःकरणमें बिना निमित्तके ही अनेकों भाव
प्रतिबिम्बित होते हैं ॥ ६५ ॥