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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 17

प्रथमोऽध्यायः । ३
यथा घ्राणोल्लासकता मृगनाभेः स्वतः स्थिता ।
एवं दत्तात्रेयमुखाच्छ्रुत्वा माहात्म्यवैभवम् ॥ १० ॥
रामः सर्वजनारामो जामदग्न्यः शुभाशयः ।
भक्त्यापहृतसच्चित्तस्तूष्णीं किञ्चिद्बभूव ह ॥ ११ ॥
अथासाद्य बहिर्वृत्तिं भरितानन्दलोचनः ।
रोमाञ्चपीवरवपुः स्वान्तरानन्दनिर्भरः ॥ १२ ॥
हर्षो नायन्त्रोमकूपविभेदान्निर्गमन्निव ।
प्रणाम दत्तगुरुं दण्डवच्चरणान्तिके ॥ १३ ॥
उत्थाय हर्षभरितः प्राह गद्गदसुस्वरः ।
धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं श्रीगुरो त्वत्प्रसादतः ॥ १४ ॥
यस्य मे करुणासिन्धुस्तुष्टः साक्षाद्गुरुः शिवः ।
यस्मिंस्तुष्टे ब्रह्मपदमपि स्यात् तृणसम्मितम् ॥ १५ ॥
करनेका सहज स्वभाव होता ही है, जिस प्रकार कि कस्तूरीमें
घ्राणेन्द्रियको आनन्दित करनेका गुण स्वभावसे ही रहता है ॥८-१० पू०॥
जमदग्निपुत्र परशुरामजीने इस प्रकार श्रीदत्तात्रेयजीके मुखसे
त्रिपुरदेवीके माहात्म्यका उत्कर्ष सुना तो उनका हृदय निर्मल हो
गया । वे सभी जीवोंमें माँकी झाँकी करके प्रेममग्न हो गये, भक्ति-
भावसे उनका हृदय आप्लावित हो गया और थोड़ी देरके लिये वे
कुछ मौन-से हो गये ॥ १० उ०-११ ॥
फिर बाह्यवृत्ति होनेपर उनके नेत्रोंमें आनन्दाश्रु छलक आये, शरीर
पुलकावलीसे पूर्ण हो गया और हृदय आनन्दसे सराबोर हो गया ॥१२॥
उनके हृदयमें न समा सकनेके कारण मानो हर्ष रोमकूपोंके द्वारा
पुलकावलीके रूपमें छलकने लगा । उन्होंने सद्गुरु श्रीदत्तात्रेयजीको,
उनके चरणोंमें दण्डवत् पड़कर प्रणाम किया ॥ १३ ॥
फिर उठकर हर्षातिरेकसे गद्गदकण्ठ हो प्रार्थना की, 'गुरुदेव !
आपके कृपाप्रसादसे मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ ॥ १४ ॥
इसीसे मेरे प्रति साक्षात् शिवस्वरूप करुणासागर गुरुदेव भी
प्रसन्न हो गये हैं, जिनके प्रसन्न होनेपर ब्रह्मपद भी तृणके समान
तुच्छ हो जाता है ॥ १५ ॥