त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
मृत्युरप्यात्मतां याति यस्मात्तुष्टाद्गुरोर्नृनु ।
ममाकाण्डादेव गुरुः सोऽद्य तुष्टो महेश्वरः ॥ १६ ॥
मन्ये सर्वं मया प्राप्तमित्येव कृपया गुरोः ।
नाथ माहात्म्यमखिलं श्रुतं त्वत्कृपयाधुना ॥ १७ ॥
तामुपासितुमिच्छामि त्रिपुरां परमेश्वरीम् ।
तदुपास्तिक्रमं ब्रूहि मह्यं सुकृपया गुरो ॥ १८ ॥
इति सम्प्रार्थितो दत्तगुरुरालक्ष्य भार्गवे ।
योग्यतां त्रिपुरोपास्तौ सच्छ्रद्धाभक्तिबृंहिताम् ॥ १९ ॥
क्रमेण दीक्षयामास त्रिपुरोपास्तिहेतवे ।
जामदग्न्योऽपि सम्प्राप्य त्रैपुरं दीक्षणं शुभे ॥ २० ॥
सर्वदीक्षासमधिकं पूर्णतत्त्वप्रबोधनम् ।
मन्त्रयन्त्रवासनाभिरन्वितमखिलं क्रमम् ॥ २१ ॥
तथा जिन सद्गुरुदेवके प्रसन्न होनेपर मृत्यु भी अपना आत्मा
ही हो जाता है, आज वे मेरे शिवस्वरूप गुरुदेव अकारण ही मुझपर
प्रसन्न हैं ॥ १६ ॥
उन गुरुदेवकी कृपासे, मुझे ऐसा जान पड़ता है, आज सभी
पदार्थ मुझे प्राप्त हो गये हैं। हे नाथ ! आपकी कृपासे अब मैंने
श्रीत्रिपुरादेवीका माहात्म्य तो सारा सुन लिया ॥ १७ ॥
अतः मैं उन भगवती त्रिपुराकी उपासना करना चाहता हूँ।
गुरुदेव ! आप कृपा करके मुझसे उनकी उपासनाका क्रम
कहिये' ॥ १८ ॥
परशुरामके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दत्तात्रेयजीने देखा कि
त्रिपुरादेवीके प्रति श्रद्धा और भक्तिकी अधिकताके कारण वे उनकी
उपासनाके अधिकारी हो गये हैं। अतः उन्होंने क्रमशः त्रिपुरोपासनाके
लिये उन्हें दीक्षा दी ॥ १८-२० पू० ॥
इस प्रकार शुभ मुहूर्त्तमें परशुरामजीने त्रिपुरोपासनाकी दीक्षा
प्राप्त की, जो सभी प्रकारकी दीक्षाओंसे श्रेष्ठ है और पूर्णतत्त्वका
बोध करानेवाली है। जिस प्रकार भौंरा कमलसे रस ग्रहण करता है