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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 404 में से

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पृष्ठ 16

२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
अथ ते कथयाम्यद्य ज्ञानखण्डं महाद्भुतम् ।
यच्छ्रुत्वा न पुनः क्वापि मनुष्यः शोकमृच्छति ॥ ३ ॥
वैदिकं वैष्णवं शैवं शाक्तं पाशुपतं तथा।
विज्ञानं सम्यगालोच्य यदेतत्प्रविनिश्चितम् ॥ ४ ॥
नैतद्विज्ञानसदृशमन्यन्मानसमारुहेत् ।
यथा श्रीदत्तगुरुणा भार्गवाय निरूपितम् ॥ ५ ॥
उपपत्त्युपलब्धिभ्यां समेतं बहु चित्रितम् ।
अत्रोक्तेनापि नो वेद यदि कश्चिद्विमूढधीः ॥ ६ ॥
स केवलं दैवहतः स्थाणुरेव न संशयः ।
न तस्य स्यादपि ज्ञानं साक्षाच्छिवनिरूपितम् ॥ ७ ॥
तत्ते शृणु समाख्यास्ये ज्ञानखण्डात्मना स्थितम् ।
अहो सतामद्भुतं हि वृत्तं सर्वगुणोत्तरम् ॥ ८ ॥
यन्मत्तोप्येष देवर्षिः शुश्रूषत्यपि किञ्चन ।
अनुग्राहकता चैषा सतां सहजसम्भवा ॥ ९ ॥
अब मैं तुम्हें बड़ा ही विचित्र ज्ञानखण्ड सुनाता हूँ, जिसे श्रवण
कर लेनेपर मनुष्य फिर कभी [जन्म-मरणरूप] शोकको प्राप्त नहीं
होता ॥ ३ ॥
इस सिद्धान्तका वैदिक, वैष्णव, शैव, शाक्त और पाशुपत सभी
दर्शनोंका भली भाँति विचार करके निश्चय किया गया है ॥ ४ ॥
दूसरा कोई भी मतवाद ऐसा नहीं है जो इस सिद्धान्तके समान
बुद्धिमें आरूढ़ हो सके। सद्गुरु श्रीदत्तात्रेयजीने परशुरामजीके
प्रति इसका निरूपण किया है ॥ ५ ॥
यह युक्ति और उपलब्धिसे सम्पन्न और बड़ा ही विचित्र है। यदि
किसी मूढ़मतिको यहाँ बतायी हुई बातोंसे भी परमार्थका बोध न
हो तो उसे निःसन्देह भाग्यहीन और कोरा ठूँठ ही समझना चाहिये।
उसे स्वयं श्रीशंकरजी उपदेश करें तो भी ज्ञान नहीं हो सकता ॥ ६-७ ॥
अच्छा सुनो, अब मैं ज्ञानखण्डके रूपमें स्थित वह ज्ञान तुम्हें
सुनाता हूँ। अहो ! सत्पुरुषोंका व्यवहार सचमुच बड़ा ही अनोखा
और सबसे बढ़कर होता है; तभी तो आप स्वयं देवर्षि मुझसे यह
यत्किञ्चित् ज्ञानकथा सुनना चाहते हैं। सत्पुरुषोंमें इस प्रकार कृपा