त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः । १५१
निरुपादान एत्रादौ सृष्टवानखिलं जगत् ।
यस्मान्महेश्वरः पूर्णस्वच्छस्वातन्त्र्यसंयुतः ॥ ३७ ॥
चिदात्मभित्तावखिलं चित्रमुन्मीलयज्जगत् ।
न तज्जगत्सम्भवति बहिः क्वचिदवस्थितम् ॥ ३८ ॥
पूर्णत्वाद्दीश्वरस्येह स्थानमन्यन्न विद्यते ।
अन्यस्थानस्थितं तच्च कथञ्चिन्नैव सिध्यति ॥ ३९ ॥
तथा च दर्पणाभोगे प्रतिबिम्बवदेव हि ।
जगदुन्मीलितं देवे चैवं सर्वं समञ्जसम् ॥ ४० ॥
जगदादेर्हि देवस्य योगीव जगतः क्रिया ।
सङ्कल्पनगरप्रख्या सृष्टिर्देवस्य सम्मता ॥ ४१ ॥
राम ते मानसी सृष्टिर्मनोमध्यैव केवला ।
अनेकमातृमेयादिप्रचुरा ह्यवभासते ॥ ४२ ॥
उसने बिना किसी अन्य सामग्रीके आरम्भमें जगत्की रचना की,
क्योंकि वह महेश्वर पूर्ण, शुद्ध और स्वातन्त्र्यशक्तिसे सम्पन्न है ॥३७॥
उसने अपने ही चैतन्यस्वरूप भीतपर यह जगत्-रूप चित्र प्रकट
किया। वह जगत् उससे बाहर कहीं अन्यत्र नहीं हो सकता ॥ ३८ ॥
क्योंकि परमात्मा पूर्ण है, उससे भिन्न और कोई स्थान ही नहीं
है। [ यदि उसे अपूर्ण मानें तब भी चेतनसे भिन्न होनेके कारण
अन्य स्थान अचेतन अर्थात् अप्रकाश रूप होगा, अतः ] उससे भिन्न
स्थानमें स्थित होनेपर तो उस जगत्की किसी प्रकार सिद्धि ही नहीं
हो सकती ॥ ३९ ॥
अतः जिस प्रकार दर्पणमें प्रतिबिम्बकी प्रतीति होती है उसी
प्रकार भगवान्में जगत्का भास हुआ—इस प्रकार माननेसे सब संगति
लग जाती है ॥ ४० ॥
जगत्के आदिकारण भी भगवान्की यह जगत्सम्बन्धिनी क्रिया
योगीके समान है। उन परमात्मदेवकी यह जगद्रचना सङ्कल्पद्वारा
रचे हुए नगरके समान है ॥ ४१ ॥
परशुराम ! तुम्हारी जो मनःकल्पित सृष्टि होती है वह केवल
मनोमात्र ही तो होती है, किन्तु उसमें अनेकों प्रमाता ( जीव ) और
उनके प्रमेय ( विषय ) आदि भी भासते ही हैं ॥ ४२ ॥