त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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महासत्ता जगद्ग्रासशीला पूर्णावभासते ।
समुद्रमन्तरा तोयं दिवानाथं विना प्रभाः ॥ ३१ ॥
यथा न सन्ति तद्वद् वै संविद्रूपं विना जगत् ।
तस्मादेष महादेवः शुद्धचैतन्यविग्रहः ॥ ३२ ॥
आसीत्सृष्टेः पुरा तस्मादुत्पन्नं तत्र संस्थितम् ।
तस्मिन्विलीयते चान्ते जगदेतच्चराचरम् ॥ ३३ ॥
इत्यागमप्रसिद्धोऽर्थस्तन्न विप्रतिपद्यते ।
अदृष्टार्थेषु संवादात्प्रमाणं ह्यागमो भवेत् ॥ ३४ ॥
दृश्यन्ते मणिमन्त्रादिसिद्धयः सर्वतो यतः ।
नाल्पप्रज्ञो विजानीयान्मणिमन्त्रमहाफलम् ॥ ३५ ॥
तस्मात्सर्वज्ञगदितो ह्यागमः सर्वदर्शनः ।
तत्रोक्तो देव एवादौ सृष्टेर्जगत आस्थितः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्को अपनेमें लीन कर लेनेवाली वह महा-
सत्ता ही पूर्णरूपसे प्रकाशमान है । जिस प्रकार समुद्रके बिना तरंग
और सूर्यके बिना प्रभाकी सत्ता नहीं है उसी प्रकार उस चिन्मात्र के
{ बिना संसार नहीं है ॥ ३१-३२ पू० ॥
अतः सृष्टिसे पहले यह शुद्धचैतन्यस्वरूप महेश्वर ही थे । यह चरा-
चर जगत् उन्हींसे उत्पन्न हुआ है, उन्हींमें स्थित है और अन्तमें
उन्हींमें लीन होता है ॥ ३२ उ०-३३ ॥
यही श्रुतिसम्मत सिद्धान्त है, इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं
हो सकता, क्योंकि जहाँ अदृष्ट पदार्थके विषयमें शंका होती है वहाँ श्रुति
ही प्रमाण मानी जाती है ॥ ३४ ॥
[ देखो, शास्त्रद्वारा प्रतिपादित होनेके कारण ही ] सर्वत्र मणि और
मन्त्रादिसे प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ देखी जाती हैं। इन मणि-मन्त्रा-
दिके महान् प्रभावको कोई अल्पबुद्धि जीव नहीं जान सकता ॥ ३५ ॥
इसलिये सर्वज्ञ परमेश्वरके द्वारा कहा हुआ वेद ही सबसे बड़ा
प्रमाण है । उसमें कहा है कि जगत्की रचनासे पूर्व एक परमात्मा ही
था ॥ ३६ ॥