त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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मधुक्षीव इवात्यन्तं व्यवहारपरो जनः ॥ ६१ ॥
एवंविधं तन्नगरं ऋषयः सनकादयः ।
प्रसिद्धविद्यानगरमित्याख्यमृचुरागताः ॥ ६२ ॥
यत्र कीराः पञ्जरस्था अपि वाचो वदन्ति वै ।
चितिरूपं स्वमात्मानं भजध्वं चेत्यवर्जितम् ॥ ६३ ॥
नास्ति चेत्यं चितेरन्यद्दर्पणप्रतिबिम्बवत् ।
चितिश्चेत्यं चितिरहं चितिः सर्वं चराचरम् ॥ ६४ ॥
यतः सर्वं चितिमनु भाति सा तु स्वतन्त्रतः ।
अतश्चितिं जनाः सर्वभासिनीं सर्वसंश्रयाम् ॥ ६५ ॥
भजध्वं भ्रान्तिमुत्सृज्य चितिमात्रं सुदृष्टयः ।
तिर्यञ्चोप्येवमत्यन्तं यत्र वाचो वदन्ति वै ॥ ६६ ॥
प्रसिद्धविद्यानगरं तदद्यापि प्रचक्षते ।
हर्षित होते, खिन्न होते और क्रोध-सा करते हुए भी वे मद्योन्मत्तके
समान निरन्तर अत्यन्त व्यवहारपरायण रहते थे ॥ ६० उ०-६१ ॥
इस प्रकारके उस नगरमें एकबार सनकादि ऋषि आये । उन्होंने
उसका 'विद्यानगर' नाम रख दिया¹ ॥ ६२ ॥
वहाँ पिंजरोंमें बन्द तोते भी इन वाणियोंका पाठ करते थे—
“चेत्य पदार्थोंसे रहित जो चिन्मात्र अपना आत्मा है उसका भजन
करो ॥ ६३ ॥
दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान चेत्य पदार्थ चिन्मात्रसे भिन्न नहीं
है । चिति (चिन्मात्र) ही चेत्य है, चिति ही 'मैं' हूँ और चिति
ही सारा चराचर, क्यों इन सबका भान चितिसे ही होता है और
चिति स्वयंप्रकाश है ॥ ६४-६५ पू० ॥
इसलिये हे लोगो ! भ्रान्तिको त्यागकर केवल चितिपर ही दृष्टि
रखते हुए सबको प्रकाशित करनेवाली और सभीकी आश्रयभूता
चितिका ही भजन करो” ॥ ६५ उ०-६६ पू० ॥
जहाँ पक्षी भी सर्वथा ऐसी वाणी बोलते हैं वह सुप्रसिद्ध विद्या-
नगर आज भी देखा जाता है ॥ ६६ उ०-६७ पू० ॥
१. आगेके चार श्लोक चतुर्थ अध्यायके अन्तमें भी आ चुके हैं ।