त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरतत्त्वपरैर्वाक्यैर्व्याहरन्तः परस्परम् ।
नटा नाट्यं वितन्वन्ति पात्रैस्तत्त्वप्रसङ्गजैः ॥ ५५ ॥
विवेकवार्तापरमं वचो गायन्ति गायकाः ।
विदूषका दूषयन्ति लोकव्यवहृतिं सदा ॥ ५६ ॥
शास्त्राणि पाठयन्ति स्म विद्वांसः पाठकान् जनान् ।
परतत्त्वविचारार्हेरुदाहरणमण्डलैः ॥ ५७ ॥
एवं तत्र नरा नार्यो दासा दास्यो नटा विटाः ।
भृत्या भटा मन्त्रिणश्च शिल्पिनो वारयोषितः ॥ ५८ ॥
सर्वे वेदितवेद्यास्ते विशालनगरेऽभवन् ।
प्राक्तसंस्कारबलेनैव व्यवहारपरायणताः ॥ ५९ ॥
न संस्मरति संवृत्तं शुभं वाप्यशुभं तथा ।
भविष्यं नानुसन्धत्ते हर्षशोकादिसाधनम् ॥ ६० ॥
वर्तमाने स्मयन्हृष्यन्खिद्यन् क्रुध्यन्निवान्वहम् ।
करते हुए ही अपने स्वामीकी सेवा करते थे। तथा नट लोग तत्त्व-
प्रसंगसम्बन्धी [ विवेक-मोह आदि ] पात्रोंके द्वारा ही नाटक खेलते
थे ॥ ५४-५५ ॥
गानेवाले विवेककी चर्चासे भरी वाणियोंका ही गान करते थे
तथा विदूषक लोग सर्वदा लौकिक व्यवहारका उपहास करते थे ॥ ५६ ॥
विद्वान् लोग विद्यार्थियोंको परमतत्त्वके विचारका पोषण करने-
वाले उदाहरणोंसे पूर्ण शास्त्रोंका अध्ययन कराते थे ॥ ५७ ॥
इस प्रकार उस विशाल नगरमें नर, नारी, दास, दासी, नट,
विदूषक, सेवक, सिपाही, मन्त्री, कारीगर, और वेश्याएँ सभी जानने
योग्य परमतत्त्वको जान गये ॥ ५८-५९ पू० ॥
अपने पूर्वसंस्कारोंके अनुसार व्यवहार करते हुए भी उन्हें अपनी
क्रियाओंमें शुभ या अशुभ का अनुसन्धान नहीं होता था। [ उनकी सब
चेष्टाएँ बच्चोंके समान स्वभावसे ही होती थीं ] ॥ ५९ उ०-६० पू० ॥
जिसके कारण हर्ष या शोकादिकी कल्पनाएँ होती हैं उस भविष्य-
का वे कभी चिन्तन नहीं करते थे। वर्तमानमें प्रसंगवश मुसकराते,